भारत का बड़ा कदम, होर्मुज निर्भरता घटाने के लिए गुजरात से ओमान तक पाइपलाइन की तैयारी
Hormuz Strait Petrol LPG Crisis: मध्य पूर्व और होर्मुज जलडमरूमध्य में नए सिरे से पनपे तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है। वहीं, भारत ने ओमान के सहयोग से होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करने का एक वैकल्पिक रास्ता खोज लिया है। भारत में एनर्जी की सप्लाई बाधित न हो इसे लेकर गुजरात से ओमान के बीच एक लंबी पाइपलाइन बिछाने के प्रोजेक्ट का ऐलान किया गया है। यह गैस पाइपलाइन अरब सागर के पार करीब 2000 किलोमीटर लंबी समुद्र की गहराई में बिछाई जाएगी।

भारत अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत से ज्यादा प्राकृतिक गैस आयात करता है। इसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से एलएनजी (LNG) के रूप में आता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यह वही समुद्री रास्ता है, जहां हाल के महीनों में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। अगर किसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है या वहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो भारत समेत दुनिया के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है।
दुनिया लगातार बदलती जियो पॉलिटिक्स के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुनिश्चित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। ओमान-गुजरात डीप-सी गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट को लेकर पिछले 30 सालों में कई बार विचार किया गया, लेकिन भारी खर्च, तकनीकी समस्याओं और इस प्रोजेक्ट से होने वाले फायदे जैसे सवालों के कारण यह कभी प्लानिंग से आगे नहीं बढ़ पाया। साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज (SAGE) सालों से इस प्रोजेक्ट को बढ़ावा दे रही है। उनका कहना है कि वे पहले ही तय रास्ते के लिए तकनीकी और वित्तीय आकलन के साथ-साथ समुद्र की सतह का सर्वे भी कर चुके हैं।
ओमान से गुजरात तक गैस पाइपलाइन
इस प्रोजेक्ट पर करीब 40,000 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। यह दुनिया के सबसे गहरे समुद्री रास्तों से ओमान से सीधे भारत के पश्चिमी तट (गुजरात) तक नेचुरल गैस लाएगा। इस पाइपलाइन के बन जाने से खाड़ी देशों और भारत के बीच सीधे एनर्जी का सुरक्षित रास्ता तैयार हो जाएगा। इससे भारत को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे समुद्री रास्तों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
भारत के लिए क्यों अहम है ये प्रोजेक्ट
भारत अपनी कच्चे तेल की अधिकांश जरूरतों को आयात करता है और नेचुरल गेस विशेष रूप से एलएनजी (LNG) के लिए काफी हद तक विदेशी सप्लाई पर निर्भर है। इसका अधिकांश हिस्सा खाड़ी देशों से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज होकर भारत आता है। इस रूट पर किसी भी तरह की रुकावट आई तो इसका सीधा असर ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर पड़ सकता है, जिससे जहाजों का किराया, ईंधन की कीमत और सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
मध्य पूर्व संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में मौजूदा स्थिति ने केवल इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर रहने के जोखिम को उजागर किया है। एलएनजी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव और जहाजरानी की सुरक्षा ने इस पाइपलाइन परियोजना में नए सिरे से रुचि जगाई है। LNG आयात से पहले गैस को लिक्विड में बदला जाता है। उसके बाद टैंकरों के जरिए लाया जाता है और भारत पहुंचने पर उसे दोबारा गैस में बदला जाता है। वहीं पाइपलाइन के जरिए गैसे सीधे भारत तक पहुंच सकेगी।
कैसा है प्रस्तावित पाइपलाइन प्रोजेक्ट?
पेट्रोलियम मंत्रालय ने हाल ही में सरकारी कंपनियों गेल (GAIL), इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (IEL) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOL) को एसएजीई (SAGE) द्वारा प्रस्तुत पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन के आधार पर विस्तृत व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करने का कार्य सौंपा है। इससे ओमान के साथ गैस आपूर्ति, वित्तपोषण और कार्यान्वयन पर औपचारिक वार्ता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
इस प्रोजेक्ट के तहत पाइपलाइन का कुछ हिस्सा समुद्र तल से 3,000 मीटर (3 KM) से भी अधिक नीचे होने की संभावना है। इससे इससे एक तरफ जहां भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने में मदद मिल सकती है, वहीं ओमान को एक स्थिर एक्सपोर्ट मार्केट मिल जाएगा। प्रोजेक्ट के प्रस्तावों के मुताबिक, इस पाइपलाइन के माध्यम से गैस भेजने की लागत 2 डॉलर से लेकर 2.25 डॉलर प्रति MMBTU तक हो सकती है।(एजेंसी)

