कच्चे तेल की कीमतें गिरीं, लेकिन पेट्रोल-डीजल पर अभी राहत नहीं: केंद्रीय मंत्री का बड़ा बयान
नई दिल्ली: ईरान-अमेरिका समझौते के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आ रही है, लेकिन सरकार ने अभी तक इस बारे में कोई बयान जारी नहीं किया है कि देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी की जाएगी या नहीं। केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने गुरुवार को कहा कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने पर ईंधन की कीमतों में तत्काल कमी नहीं की जा सकती। इसका कारण बताते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों को निर्धारित करने में कई कारक शामिल होते हैं, जिसमें सस्ते कच्चे तेल को भारत पहुंचने में लगने वाला समय भी शामिल है।
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को रोकने के लिए “शांति समझौते” की घोषणा के बाद, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में पेट्रोलियम की कीमतें 111 दिनों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई हैं। गुरुवार को ब्रेंट ऑयल फ्यूचर्स में लगभग 2% की गिरावट आई और यह लगभग 77 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। इसके चलते भारत द्वारा कच्चे तेल की खरीद दर में भी भारी कमी आई है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ द्वारा 18 जून, 2026 को जारी नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की कीमत 17 जून, 2026 को गिरकर 78.48 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल हो गई। परिणामस्वरूप, जून के पहले 17 दिनों के दौरान कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की औसत कीमत भी घटकर 91.02 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल हो गई।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या बोले केंद्रीय मंत्री?
पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और पर्यटन राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने हाल ही में ईंधन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि लगभग 3.94 प्रति लीटर की वृद्धि का असर तो हुआ है, लेकिन कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में गिरावट के कारण इसे तुरंत वापस नहीं लिया जा सकता। उन्होंने कहा, “सस्ता कच्चा तेल होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत पहुंचता है। वहां भारी मात्रा में जहाजों के आवागमन के कारण इसमें समय लगता है, इसलिए स्थिति को सामान्य होने में कुछ समय लगेगा।”
केंद्र सरकार को हुआ 12 हजार करोड़ का नुकसान: सुरेश गोपी
ईरान-अमेरिका युद्ध का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि फरवरी में युद्ध शुरू होने के बाद तेल कंपनियों को भारी नुकसान हुआ और केंद्र सरकार पर भी काफी वित्तीय बोझ पड़ा। गोपी ने कहा, “इस नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र सरकार को 12 हजार करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ा। किसी भी राज्य सरकार ने ईंधन की बढ़ी कीमतों पर उत्पाद शुल्क कम करके अपना राजस्व नहीं घटाया। केंद्र सरकार को अपना कामकाज करना है और तेल कंपनियों को अपना अस्तित्व बनाए रखना है।”
गौरतलब है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो चुका है, जिसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य वाणिज्यिक जहाजों के लिए खुल गया है। विश्व के लगभग 20% कच्चे तेल का परिवहन इसी समुद्री मार्ग से होता है। परिणामस्वरूप, समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में काफी गिरावट आई है। होर्मुज नाकाबंदी के दौरान कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, लेकिन आज ये लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल हैं।(एजेंसी)

