प्रदर्शन के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट की नजर, धरना स्थलों को लेकर आ सकता है बड़ा फैसला
Supreme Court : आज सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों का मुद्दा उठाया गया। याचिका में तर्क दिया गया कि जंतर-मंतर अब विरोध प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है। याचिका में कहा गया कि विरोध प्रदर्शनों से यातायात और चिकित्सा देखभाल जैसी आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति बाधित होती है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिका का जवाब देते हुए कहा, “हम इसे एक महत्वपूर्ण मामला मानते हैं।” इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना नागरिक का अधिकार है। भारतीय संविधान यह अधिकार प्रदान करता है। हालांकि, एक जनहित याचिका में दिल्ली में जंतर-मंतर के विकल्प के रूप में एक नए विरोध स्थल की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि एक ही स्थान पर निर्भर रहना नागरिकों के अधिकारों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच टकराव पैदा कर रहा है। अब सर्वोच्च न्यायालय इस बात की जांच करेगा कि वैकल्पिक विरोध स्थल का विकास संविधान और जनहित दोनों के अनुरूप होगा या नहीं।
चीफ जस्टिस की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि याचिका में कहा गया है कि जंतर-मंतर अब ऐसे प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है। इससे परिवहन और चिकित्सा सामग्री की आपूर्ति जैसे मुद्दे प्रभावित होते हैं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम इसे एक महत्वपूर्ण मामला मानते हैं।” उन्होंने सॉलिसिटर जनरल से इस मामले पर निर्देश लेने को कहा और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर मामले को अलग से सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान, वकील ने अदालत को बताया कि अरविंद केजरीवाल ने एक टाउन हॉल मीटिंग बुलाई थी और प्रधानमंत्री आवास तक मार्च करने का फैसला किया था। उन्होंने कहा कि 20 जुलाई जैसी घटना दोबारा नहीं होनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने जवाब दिया कि उन्हें स्थिति को कैसे संभालना है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “अगर वे ऐसा नहीं कर पाते और कुछ गड़बड़ हो जाती है, तो वे हमारे पास आ सकते हैं। मुझे विश्वास है कि वे इसे संभाल लेंगे।”
मामला क्या है और सुप्रीम कोर्ट में क्या मांग की गई है?
सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि दिल्ली का जंतर-मंतर लंबे समय से विरोध प्रदर्शनों का एक प्रमुख स्थल रहा है, लेकिन समय के साथ, क्षमता, सुरक्षा और सार्वजनिक सुविधाओं से संबंधित समस्याएं बढ़ गई हैं।
याचिका में कहा गया है कि जंतर-मंतर अब बड़े प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है क्योंकि इससे आवागमन में कठिनाई होती है और आपातकालीन सेवाओं, विशेष रूप से चिकित्सा सुविधाओं की आपूर्ति भी प्रभावित होती है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से केंद्र सरकार और दिल्ली प्रशासन को विरोध प्रदर्शनों के लिए अतिरिक्त और सुव्यवस्थित स्थान विकसित करने का निर्देश देने का आग्रह किया, यह तर्क देते हुए कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए केवल एक स्थान पर्याप्त नहीं है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील ने जंतर-मंतर पर ऐसे विरोध प्रदर्शनों के दौरान व्याप्त अराजकता की ओर ध्यान दिलाते हुए अदालत से इस मुद्दे पर गौर करने का आग्रह किया ताकि 20 जुलाई जैसी घटना दोबारा न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
प्रारंभिक सुनवाई के दौरान अदालत याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गई। फिलहाल, अदालत ने मामले की खूबियों पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब याचिका पर अलग से सुनवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले क्या कहते हैं?
इस तरह के विरोध प्रदर्शनों और संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के बीच का विरोधाभास पहले भी सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है। मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं और प्रशासन का यह दायित्व है कि वह नागरिकों के इस अधिकार की रक्षा करे।अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020) (शाहीन बाग मामला) में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि विरोध प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकालीन कब्जा अस्वीकार्य है। यह कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट पहुंची नई याचिका भी इनसे जुड़ी अगली कड़ी है। (एजेंसी)

