अयोध्या के बाद अब विंध्याचल मंदिर के चढ़ावे पर उठे सवाल, आभूषणों के हिसाब पर मांगा जवाब
UP. News: अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी की जांच अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि यूपी के मिर्जापुर में स्थित विश्व प्रसिद्ध मां विंध्यवासिनी धाम में दान किए गए सोने-चांदी के गहनों के रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठने लगे हैं। ये सवाल किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं, बल्कि श्री विंध्य पांडा समाज के एक पूर्व पदाधिकारी ने उठाए हैं—यह संगठन लंबे समय से मंदिर के कामकाज से जुड़ा रहा है। उनका कहना है कि मंदिर के दान-पात्रों में जमा सोने-चांदी के गहनों की न तो नियमित जांच होती है और न ही उनके विस्तृत रिकॉर्ड को सार्वजनिक किया जाता है। ऐसे हालात में, भक्तों का इस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाना स्वाभाविक है।
माँ विंध्यवासिनी धाम देश के सबसे प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ रोजाना हजारों भक्त पूजा-अर्चना के लिए आते हैं, और नवरात्रि व अन्य खास त्योहारों के दौरान यह संख्या लाखों तक पहुंच जाती है। भक्त अपनी आस्था और मन्नत के अनुसार नकद, सोने-चाँदी के गहने और अन्य कीमती वस्तुएं दान करते हैं। मंदिर परिसर के साथ-साथ कालीखोह और अष्टभुजा मंदिरों में कुल 22 दान-पात्र रखे गए हैं। इसके अलावा, डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए कई जगहों पर QR कोड भी लगाए गए हैं, जिससे भक्तों के लिए दान देना आसान हो गया है। दान में मिली चीजों की गिनती के लिए इन दान-पात्रों को हर तीन से चार महीने में खोला जाता है—यह प्रक्रिया प्रशासनिक देखरेख में पूरी की जाती है। हालांकि, अब इस व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

‘पीली और सफेद धातु’ लिखकर रख दिए जाते हैं आभूषण !
श्री विंध्य पांडा समाज के पूर्व अध्यक्ष राजन पाठक का आरोप है कि दान पेटियों से मिले सोने-चांदी के गहनों का कोई विस्तृत रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है। उनका कहना है कि रजिस्टर में गहनों को सिर्फ ‘पीली धातु’ और ‘सफेद धातु’ के तौर पर दर्ज किया जाता है, न कि गहने के प्रकार, वज़न या अनुमानित कीमत के साथ। पाठक के अनुसार, जब भी कोई भक्त गहना दान करे, तो उसकी पूरी जानकारी दर्ज की जानी चाहिए। ऐसा करने से न केवल रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था बेहतर होगी, बल्कि भक्तों का भरोसा भी बढ़ेगा।
1982 से व्यवस्था, लेकिन स्टॉक रजिस्टर नहीं ?
राजन पाठक का कहना है कि भले ही विंध्य विकास परिषद 1982 से मंदिर का कामकाज संभाल रही है, लेकिन अब तक गहनों के लिए कोई व्यवस्थित स्टॉक रजिस्टर या सार्वजनिक इन्वेंट्री सिस्टम नहीं बनाया गया है। उनका तर्क है कि दान की गिनती सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का मामला भी है। दान में मिली चीजों का पूरा रिकॉर्ड रखने से भविष्य में किसी भी तरह के विवाद या शक की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। उन्होंने मांग की है कि दान पेटियों से निकले कैश और गहनों को गिनती के दौरान सबके सामने दिखाया जाए और नियमित रूप से इन्वेंट्री लिस्ट तैयार करके उसे पब्लिश किया जाए।
आखिर कितना आता है दान?
मंदिर प्रशासन के अनुसार, विंध्याचल, कालीखोह और अष्टभुजा मंदिरों में रखे 22 दान-पात्रों से हर साल लगभग 1.5 करोड़ की आय होती है। हालांकि, सोने-चांदी के गहनों के बारे में प्रशासन का कहना है कि इनकी मात्रा बहुत ज्यादा नहीं होती। जो भी गहने मिलते हैं, उन्हें डबल-लॉकर सिस्टम का इस्तेमाल करके सुरक्षित रखा जाता है। यहीं से विवाद शुरू होता है। श्री विंध्य पांडा समाज के पूर्व अध्यक्ष राजन पाठक का तर्क है कि मात्रा चाहे जो भी हो, गहनों का पूरा रिकॉर्ड होना चाहिए। वहीं, प्रशासन का कहना है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार की जाती है और सभी सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन किया जाता है।
सचिव ने कहा किसी तरह की कोई शिकायत नहीं आई
विंध्य विकास परिषद के सचिव और सिटी मजिस्ट्रेट अविनाश कुमार ने इन आरोपों का जवाब दिया है। दान पेटियों की गिनती कड़ी प्रशासनिक निगरानी में होती है। गिनती की प्रक्रिया के दौरान एक मजिस्ट्रेट मौजूद रहते हैं। लेखपाल और अमीन पैसे की गिनती करते हैं और पूरी प्रक्रिया CCTV की निगरानी में की जाती है। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल में दान या दान पेटियों को लेकर कोई शिकायत नहीं आई है। गहनों के बारे में उन्होंने बताया कि सोने या चांदी की जो भी वस्तुएं मिलती हैं, उन्हें डबल-लॉक सिस्टम में सुरक्षित रखा जाता है। (एजेंसी)

