ममता बनर्जी ने बहरामपुर सांसद युसूफ पठान से मांगा इस्तीफा, जानिए क्या मिला जवाब में…
बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी लोकसभा में एंट्री का कर रही थीं प्रयास
कोलकाता। West Bengal politics इस समय राज्य की सियासत में हलचल का केंद्र बिंदु है। विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) भीतर ही टूट रही है। इस बीच, सूत्रों के अनुसार, पार्टी सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने के लिए संसद में प्रवेश करने की तैयारी कर रही हैं। इसके लिए उन्होंने बहरामपुर लोकसभा सीट से सांसद यूसुफ पठान से इस्तीफा देने का अनुरोध किया था, ताकि वह उपचुनाव लड़ सकें। हालाँकि, पठान ने इस प्रस्ताव को साफ तौर पर ठुकरा दिया है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब TMC अपने तीन दशकों के इतिहास में सबसे गहरे संकट से गुज़र रही है।
ममता बनर्जी की लोकसभा योजना और यूसुफ पठान का इनकार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी से अपनी सीट हारने के बाद, ममता बनर्जी लोकसभा में प्रवेश करना चाहती थीं। बताया जा रहा है कि उनकी निगाह बहरामपुर सीट पर थी, जिसे एक ‘सुरक्षित’ सीट माना जाता है। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने यूसुफ पठान से यह आसन खाली करने का अनुरोध किया था। Yusuf Pathan ने इनकार करते हुए साफ कर दिया कि वह लोगों के जनादेश को नजरअंदाज नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें वोट मिले अभी कुछ ही साल हुए हैं।
सौरव गांगुली ने किया मामले से इनकार
इस पूरे मामले में पूर्व क्रिकेटर और कलकत्ता नाइट राइडर्स के सह-मालिक सौरव गांगुली का नाम भी सामने आया था। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि टीएमसी सुप्रीमो ने उनसे यूसुफ पठान को यह संदेश पहुंचाने का अनुरोध किया था। हालाँकि, गांगुली ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह से नकार दिया। उन्होंने एक बयान में कहा, “ये आरोप पूरी तरह से गलत हैं। मैंने कभी ममता बनर्जी का ऐसा कोई संदेश यूसुफ पठान तक नहीं पहुंचाया।”
TMC में बगावत और बढ़ता अलगाव
58 टीएमसी विधायकों ने पार्टी के खिलाफ बगावत कर दी है, जिन्होंने खुद को विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल घोषित किया है। रितबरता बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता मिली है, जिसे टीएमसी ने अदालत में चुनौती देने का फैसला किया है।
सूत्रों के अनुसार, पार्टी के 41 सांसदों (28 लोकसभा और 13 राज्यसभा) में से करीब 20 एक साथ बीजेपी में शामिल हो सकते हैं, जिससे टीएमसी की संसदीय ताकत आधी हो जाएगी।
इस बगावत के चलते अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को भी चुनौती मिल रही है। विधायकों के एक बड़े वर्ग ने पार्टी कार्यसमिति से पार्टी के ‘मुख्य सलाहकार’ के रूप में ममता बनर्जी की अध्यक्षता की मांग की है, जबकि अभिषेक बनर्जी से दूरी बनाने की कोशिश की जा रही है।
विपक्ष के लिए खतरा?
यह सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं है। इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और ‘इंडिया’ गठबंधन पर भी पड़ेगा। टीएमसी केंद्र में बीजेपी सरकार की सबसे मुखर आलोचक रही है। पार्टी की सदस्यता में आई इस गिरावट से विपक्षी गठबंधन की ताकत कमजोर हो सकती है।
टीएमसी में जारी यह उथल-पुथल दर्शाती है कि Mamata Banerjee अनिश्चितता से घिरी हुई हैं। विधानसभा चुनावों में अपनी दोनों सीटें हारने के बाद ममता बनर्जी के लिए राज्य की राजनीति में वापसी का रास्ता मुश्किल हो गया है। यही वजह है कि वह लोकसभा के ज़रिए सियासत में वापसी का मौक़ा ढूंढ रही थीं, लेकिन पठान के इनकार और पार्टी में बढ़ती बगावत ने उनके भविष्य पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है।

