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रामलीला मैदान में INDIA ब्लॉक की महारैली: सियासी संग्राम, 12,000 करोड़ का नुकसान या ‘जबरन बंदी’? जानिए ग्राउंड रिपोर्ट

दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक रामलीला मैदान एक बार फिर राजनीतिक तापमान का केंद्र बन गया। 1 नवंबर को आयोजित INDIA ब्लॉक की महारैली खत्म होने के बाद अब सड़कों का शोर बाज़ारों और सियासी दफ्तरों में आर्थिक तकरार बनकर गूंज रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया कि विपक्ष की इस रैली ने दिल्ली के व्यापारियों की कमर तोड़ दी और करोड़ों का कारोबार ठप कर दिया। वहीं, कांग्रेस ने पलटवार करते हुए इसे पूरी तरह बीजेपी की साजिश बताया और कहा कि रैली वाले रूट पर व्यापारियों की दुकानें जबरन बंद करवाई गईं ताकि जन-आक्रोश को बदनाम किया जा सके।

इस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच व्यापारियों की शीर्ष संस्था चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) के एक पत्र ने विवाद को और हवा दे दी, जिसमें अकेले एक दिन में 12,000 करोड़ रुपये के भारी नुकसान का दावा किया गया। हालांकि, ज़मीनी स्तर पर स्वतंत्र यूट्यूबर्स और पत्रकारों के कैमरों में कैद हुई तस्वीरों ने इस पूरे विवाद का एक बिल्कुल अलग ही चेहरा सामने रख दिया।

CTI का पत्र: 12 हज़ार करोड़ के नुकसान और लाखों दुकानों की बंदी का दावा

विवाद की शुरुआत CTI द्वारा जारी एक विस्तृत पत्र और सर्वे रिपोर्ट के बाद हुई। CTI के चेयरमैन बृजेश गोयल के अनुसार, रैली के कारण पूरी दिल्ली का रिटेल और होलसेल तंत्र चरमरा गया। संगठन ने दावा किया कि रामलीला मैदान के पाँच किलोमीटर के दायरे में स्थित 12 बड़े बाज़ारों चांदनी चौक, सदर बाज़ार, खारी बावली, चावड़ी बाज़ार, नया बाज़ार, दरियागंज, पहाड़गंज, अजमेरी गेट, जामा मस्जिद, भागीरथ पैलेस, कनॉट प्लेस और करोल बाग की लगभग तीन लाख दुकानों में से ढाई लाख दुकानें बंद रहीं और 80 फीसदी तक कारोबार प्रभावित हुआ।

CTI के पत्र में आंकड़ों का ब्योरा देते हुए कहा गया कि केवल थोक और खुदरा व्यापार को करीब 8,800 करोड़ रुपये की सीधी चपत लगी। माल ढुलाई और ट्रांसपोर्टेशन ठप रहने से 1,500 करोड़ रुपये, मध्य दिल्ली के होटलों व गेस्ट हाउसों में बुकिंग रद्द होने से 500 करोड़ रुपये और कुलियों, रिक्शा चालकों व रेहड़ी-पटरी वालों की दैनिक दिहाड़ी पर करीब 200 करोड़ रुपये का असर पड़ा। CTI चेयरमैन ने सवाल उठाया कि त्योहारों के व्यस्त मौसम में व्यापारियों और फैक्ट्री मालिकों को हुए इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा।

बीजेपी का हमला बनाम कांग्रेस का ‘जबरन बंदी’ का पलटवार

बीजेपी ने CTI के आंकड़ों को आधार बनाते हुए विपक्षी गठबंधन को आड़े हाथों लिया। बीजेपी प्रवक्ताओं का कहना था कि शादियों और त्योहारों के सीजन में ऐसी रैली आयोजित करना दिल्ली के व्यापारियों और दूर-दराज के राज्यों से आने वाले खरीदारों के साथ सीधा धोखा है। ट्रैफिक जाम और बैरिकेडिंग के चलते देश के अलग-अलग कोनों से आने वाले छोटे दुकानदार दिल्ली के थोक बाज़ारों तक नहीं पहुंच सके, जिससे राजधानी का व्यापार ठप हो गया।

कांग्रेस नेतृत्व ने बीजेपी के इन आरोपों पर तीखा पलटवार किया। कांग्रेस नेताओं और दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष का दावा था कि विपक्षी रैली के रूट और आसपास के इलाकों में बीजेपी और उसके समर्थक संगठनों ने पुलिस व प्रशासन की आड़ में दुकानें जबरन बंद करवाईं, ताकि यह भ्रम फैलाया जा सके कि दिल्ली के व्यापारी रैली से नाराज हैं। राहुल गांधी ने भी सवाल उठाया कि क्या कनॉट प्लेस जैसी जगहों पर दुकानें सचमुच अपने आप बंद थीं या इसके पीछे कोई दबाव था। उन्होंने दोहराया कि पार्टी ने रैली में आए कार्यकर्ताओं और समर्थकों से बाज़ारों में जाकर स्थानीय दुकानदारों से खरीदारी करने की खुली अपील की थी।

यूट्यूबर्स के ऑन-ग्राउंड व्लॉग्स: छोटे दुकानदारों की बंपर बिक्री

सियासी बयानों और CTI के भारी-भरकम आंकड़ों के बीच असली तस्वीर तब सामने आई जब कई स्वतंत्र यूट्यूबर्स और व्लॉगर्स ने सीधे ग्राउंड ज़ीरो से लाइव वीडियो साझा किए। इन वीडियोज़ में रामलीला मैदान के प्रवेश द्वारों, अजमेरी गेट, पहाड़गंज और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन व मेट्रो स्टेशनों के आसपास लगे ठेलों और छोटी दुकानों का नज़ारा बिल्कुल अलग था।

फुटपाथ पर चाय, नाश्ता और समोसे बेचने वाले कई छोटे दुकानदारों ने यूट्यूबर्स के कैमरों पर खुलकर बताया कि आज उनकी कमाई आम दिनों से कहीं ज़्यादा हुई है। रामलीला मैदान के ठीक बाहर दुकान लगाने वाले एक वेंडर ने बताया कि सामान्य दिनों में उसकी दैनिक आमदनी 1,500 से 2,000 रुपये होती थी, लेकिन रैली के दिन सुबह से ही समर्थकों की इतनी भीड़ उमड़ी कि दोपहर तीन बजे तक उसका सारा सामान खत्म हो गया। पानी की बोतलें, फल, झंडे और गांधी टोपी बेचने वाले हॉकरों ने भी माना कि भीड़ के कारण उनकी बिक्री कई गुना बढ़ गई। कांग्रेस नेताओं ने भी इन्हीं वीडियोज़ को साझा करते हुए कहा कि रैली ने ज़मीनी स्तर पर छोटे कामगारों की जेब में सीधा पैसा पहुंचाने का काम किया है।

दिल्ली व्यापार महासंघ का संतुलित रुख: थोक बाज़ार और लॉजिस्टिक्स की सुस्ती

ज़मीनी हकीकत का निष्पक्ष विश्लेषण करें तो यह साफ दिखता है कि रैली का असर बाज़ार के स्वरूप के अनुसार बंटा हुआ था। जहाँ एक ओर खाने-पीने और रोज़मर्रा की सेवाएं देने वाले छोटे वेंडर्स की भारी कमाई हुई, वहीं दूसरी ओर सदर बाज़ार और खारी बावली जैसे संकरे थोक बाज़ारों के दुकानदारों ने माना कि रूट डायवर्जन, भारी सुरक्षा जांच और ट्रैफिक पाबंदियों के चलते बाहरी राज्यों से आने वाले खरीदार उन तक नहीं पहुंच सके, जिससे थोक सप्लाई चेन पूरी तरह सुस्त रही।

इस पूरे घटनाक्रम पर दिल्ली व्यापार महासंघ ने एक संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि वे लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन दिल्ली देश का सबसे बड़ा थोक व्यापारिक हब है जिस पर लाखों परिवारों का रोज़गार टिका है। महासंघ ने अपील की कि भविष्य में इस तरह के विशाल राजनीतिक आयोजनों का समय और स्थान तय करते समय शहर के संगठित व्यापार, आपूर्ति व्यवस्था और आम नागरिकों की सुगम आवाजाही को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि लोकतंत्र की आवाज़ भी बुलंद रहे और बाज़ार की गति भी न थमे।

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