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अखिलेश के ‘मिशन 2027’ में शिवपाल की एंट्री, यूपी के 20% वोटों पर नजर!

अखिलेश यादव

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज होती दिखाई दे रही हैं। समाजवादी पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता से बाहर रहने के बाद अब अगले विधानसभा चुनाव में वापसी की रणनीति बनाने में जुटी है। लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन से उत्साहित सपा के सामने अब उस समर्थन को विधानसभा स्तर पर दोहराने की चुनौती है।

इसी रणनीति के तहत पार्टी के भीतर अखिलेश यादव और शिवपाल यादव की भूमिकाएं अलग-अलग मोर्चों पर नजर आ रही हैं। अखिलेश यादव जहां पार्टी के पारंपरिक आधार से आगे बढ़कर गैर-यादव ओबीसी और सवर्ण मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं शिवपाल यादव मुस्लिम समुदाय के बीच पार्टी का भरोसा मजबूत करने में जुटे हैं।

अखिलेश के PDA के साथ ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की रणनीति

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लंबे समय से PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को पार्टी की चुनावी रणनीति का अहम आधार बताते रहे हैं। अब इसके साथ उनकी राजनीति में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर भी अपेक्षाकृत नरम रुख दिखाई दे रहा है।

मंदिरों में जाना, धार्मिक आयोजनों में भाग लेना और व्यापक सामाजिक समूहों को साथ लेकर चलने का संदेश देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी की कोशिश है कि सपा पर केवल एक खास सामाजिक समूह की राजनीति करने का आरोप कमजोर हो और गैर-यादव ओबीसी तथा सवर्ण मतदाताओं में भी पार्टी की स्वीकार्यता बढ़े। हालांकि, इस रणनीति के साथ एक चुनौती भी है—पारंपरिक मुस्लिम मतदाता यह महसूस न करें कि पार्टी उनकी चिंताओं से दूरी बना रही है।

मुस्लिम वोटबैंक की जिम्मेदारी शिवपाल के कंधों पर?

इसी मोर्चे पर शिवपाल यादव सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संभल और रामपुर का दौरा किया और स्थानीय नेताओं, कार्यकर्ताओं तथा मुस्लिम समुदाय के प्रभावशाली लोगों से मुलाकात की। इन दोनों क्षेत्रों की सियासत सपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में शिवपाल का यहां पहुंचना महज संगठनात्मक दौरा नहीं बल्कि पार्टी के मुस्लिम आधार को मजबूत रखने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।

आजम खान से मुलाकात ने बढ़ाई चर्चा

रामपुर दौरे के दौरान शिवपाल यादव ने जेल में बंद आजम खान से मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने आजम खान के परिवार से भी मुलाकात की और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े लोगों तथा छात्रों से संवाद किया। शिवपाल ने आजम खान के साथ जेल में कथित व्यवहार को लेकर सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सपा की सरकार बनने पर आजम खान के खिलाफ हुई कार्रवाई का हिसाब लिया जाएगा।

इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि 2027 में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा और आजम खान को सरकार में बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी। एक बातचीत के दौरान आजम खान को रक्षा मंत्री बनाने की बात सामने आने पर शिवपाल ने कहा कि पहले उन्हें गृह मंत्री बनाया जाएगा।

संभल में भी सपा ने दिखाई सक्रियता

संभल पहुंचकर शिवपाल यादव ने स्थानीय मुस्लिम नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात की। उन्होंने संभल से जुड़े विवादों और कार्रवाई को लेकर राज्य सरकार पर राजनीतिक निशाना साधा। उन्होंने संभल के सांसद जियाउर्रहमान बर्क के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि प्रदेश में सपा की सरकार बनने पर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ राजनीतिक आधार पर की गई कार्रवाई की समीक्षा की जाएगी।

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चाचा-भतीजे की जोड़ी में दिख रहा नया तालमेल

कुछ साल पहले तक अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच राजनीतिक दूरी सपा के लिए बड़ी चुनौती रही थी। लेकिन अब दोनों एक ही राजनीतिक लक्ष्य की दिशा में काम करते दिखाई दे रहे हैं।

अखिलेश यादव पार्टी की व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि शिवपाल यादव अपने पुराने संगठनात्मक नेटवर्क और जमीनी संपर्कों के जरिए पार्टी के पारंपरिक मतदाताओं के बीच भरोसा मजबूत करने में जुटे हैं। यानी सपा की रणनीति को मोटे तौर पर ‘अखिलेश का विस्तार और शिवपाल का आधार मजबूत करना’ कहा जा सकता है।

मुस्लिम वोट क्यों है सपा के लिए अहम?

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई और राज्य के कई अन्य हिस्सों में मुस्लिम वोट चुनावी समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सपा के लिए यह वर्ग लंबे समय से पार्टी के प्रमुख समर्थक समूहों में रहा है। ऐसे में अखिलेश यादव की व्यापक सामाजिक पहुंच बनाने की कोशिश के साथ-साथ मुस्लिम मतदाताओं के बीच भरोसा बनाए रखना पार्टी के लिए बेहद जरूरी है।

इसी बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM भी मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश करती रही है। सपा के सामने चुनौती है कि उसका पारंपरिक मुस्लिम आधार किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प की ओर न खिसके।

सिर्फ MY समीकरण के भरोसे नहीं चलना चाहती सपा

सपा अब केवल मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण पर निर्भर रहने के बजाय अपना सामाजिक आधार और बड़ा करना चाहती है। लोकसभा चुनाव में मिले समर्थन ने पार्टी को यह भरोसा दिया है कि व्यापक सामाजिक गठजोड़ के जरिए विधानसभा चुनाव में भी मजबूत मुकाबला किया जा सकता है।

लेकिन विधानसभा चुनाव का गणित लोकसभा से अलग होता है। 403 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में हर क्षेत्र का जातीय और स्थानीय समीकरण अलग है। ऐसे में सपा के सामने चुनौती है कि वह अपने PDA आधार को बनाए रखते हुए अन्य सामाजिक समूहों में भी पैठ बनाए।

2027 से पहले सपा के सामने बड़ी चुनौती

अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के पारंपरिक वोटरों को साथ रखते हुए नए सामाजिक समूहों को जोड़ना है। वहीं शिवपाल यादव को मुस्लिम मतदाताओं और पुराने पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास मजबूत करने की जिम्मेदारी संभालनी पड़ सकती है।

ऐसे में संभल से रामपुर तक शिवपाल यादव की सक्रियता और अखिलेश यादव की बदलती राजनीतिक शैली को 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बड़े संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। फिलहाल चुनाव में अभी समय है, लेकिन सपा ने अपनी चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। अब देखना होगा कि अखिलेश का PDA प्लस सॉफ्ट हिंदुत्व और शिवपाल की जमीनी रणनीति मिलकर 2027 में सपा को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा पाती है या नहीं।

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