कागजों में उग गई रागी, किसानों को नहीं मिला बीज! सरकारी रिपोर्ट पर उठे सवाल
रायपुर: सरकारी फाइलों में रागी की फसल लहलहाती नजर आ रही है, लेकिन खेतों में तस्वीर कुछ और ही दिखाई दे रही है। रायपुर जिले के गोबरा-नवापारा क्षेत्र में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत रागी फसल प्रदर्शन को लेकर तैयार की गई रिपोर्ट अब सवालों के घेरे में है। विभाग ने दावा किया कि सैकड़ों किसानों ने रागी की खेती की और उन्हें बीज भी उपलब्ध कराया गया, लेकिन कई किसानों का कहना है कि उन्हें न तो बीज मिला और न ही उन्होंने रागी की खेती की। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर कागजों पर यह फसल उगी कैसे?
दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर
विभागीय रिपोर्ट में 186 किसानों को योजना का लाभ मिलने और 157.8 हेक्टेयर में रागी उत्पादन का उल्लेख किया गया है। लेकिन जब सूची में शामिल किसानों से जानकारी ली गई तो कई लोगों ने साफ कहा कि उन्होंने केवल धान की खेती की थी। कुछ किसानों ने बताया कि रागी की खेती के लिए न तो बीज मिला और न ही कोई फसल लगाई गई। इसके बावजूद उनके नाम लाभार्थियों की सूची में दर्ज हैं।
जहां रागी की खेती नहीं होती, वहां भी दिखा उत्पादन
कुछ किसानों का कहना है कि उनके गांव की भूमि रागी उत्पादन के अनुकूल ही नहीं है। कृषि विभाग के कर्मचारियों ने संपर्क जरूर किया था, लेकिन जमीन उपयुक्त नहीं होने के कारण उन्होंने प्रस्ताव ठुकरा दिया। हैरानी की बात यह है कि ऐसे किसानों के नाम भी विभाग की रिपोर्ट में रागी उत्पादक के रूप में दर्ज कर दिए गए।
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चार विकासखंडों की रिपोर्ट पर सवाल
धरसींवा, आरंग, तिल्दा और अभनपुर के कुल 186 किसानों को योजना से जोड़ने का दावा किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया कि इन किसानों ने अलग-अलग रकबे में रागी की खेती की। अब किसानों के बयानों ने इस पूरी रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विभाग ने कहा— शिकायत नहीं मिली
कृषि विभाग का कहना है कि किसानों का चयन और बीज वितरण ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से किया गया था। विभाग का दावा है कि अब तक किसी प्रकार की आधिकारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। हालांकि किसानों के बयान सामने आने के बाद पूरे मामले की पारदर्शिता पर बहस शुरू हो गई है।
जांच की मांग तेज
मामले को लेकर जनप्रतिनिधियों ने भी जांच की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यदि बिना बीज वितरण और वास्तविक खेती के रिपोर्ट तैयार की गई है तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। सरकारी योजनाओं का उद्देश्य किसानों को लाभ पहुंचाना है, न कि कागजी उपलब्धियां दिखाना। अब निगाहें इस बात पर हैं कि प्रशासन इस पूरे मामले में क्या कार्रवाई करता है।

