सरकारी स्कूलों में गायत्री मंत्र पाठ पर रोक से इनकार, हाई कोर्ट ने की याचिका खारिज
CG HC Dismisses Plea Against Gayatri Mantra: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सरकारी स्कूलों में सुबह की सभाओं के दौरान गायत्री मंत्र और अन्य प्रार्थनाओं के पाठ को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। याचिका में राज्य सरकार को सरकारी स्कूलों में हिंदू प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने से रोकने की मांग की गई थी। न्यायालय ने कहा कि इस मामले में सरकारी आदेश को रद्द करने की आवश्यकता नहीं है। न्यायालय ने कहा कि संविधान नैतिक शिक्षा पर रोक नहीं लगाता है, बशर्ते कि यह किसी विशेष धार्मिक सिद्धांत का प्रचार न करें।
यह मामला तब सामने आया जब राज्य शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभाओं में गायत्री मंत्र और कई अन्य प्रार्थनाओं को शामिल करने का निर्देश दिया। विपक्षी दलों ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे शिक्षा का भगवाकरण करार दिया।
12 जून को दायर याचिका में क्या कहा
12 जून, 2026 को दायर याचिका में कहा गया कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 25, 28(1), 29 और 30 का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सरकारी स्कूलों में धार्मिक प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने से अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र असहज या दबाव महसूस कर सकते हैं। राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने इन आरोपों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह याचिका राजनीतिक मकसद से दायर की गई है। सरकार का कहना था कि इस आदेश का मकसद धार्मिक शिक्षा देना या किसी पर धर्म थोपना नहीं है।यह केवल भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने का प्रयास है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप है।
स्कूलों में अनुशासन और व्यवस्था बनाना
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में इस्तेमाल किए गए अनिवार्य और सुनिश्चित करें जैसे शब्द केवल विद्यालयों में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से हैं। इन प्रार्थनाओं का पाठ करने से इनकार करने वाले छात्रों के खिलाफ कोई दंड या कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि गायत्री मंत्र ज्ञान, बुद्धि और सकारात्मक सोच का संदेश देता है। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य किसी धर्म का प्रचार करना नहीं है, बल्कि छात्रों में सकारात्मक विचार, एकाग्रता और नैतिक चिंतन विकसित करना है।सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि आदेश ने किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया है या किसी व्यक्ति को प्रत्यक्ष रूप से हानि पहुंचाई है। अतः न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी। (एजेंसी)

