छत्तीसगढ़ में 17 करोड़ का सर्पदंश घोटाला, आत्महत्या को बताया गया सांप का काटना
Snakebite Scam: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सांप के काटने से हुई मौतों के लिए मिलने वाले सरकारी मुआवजे से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है। पुलिस की जांच से पता चला है कि एक सुनियोजित नेटवर्क के जरिए लगभग 17 करोड़ का मुआवजाफर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट और सरकारी दस्तावेजों में हेरफेर करके हड़प लिया गया। इस मामले में अब तक एक महिला डॉक्टर समेत 17 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
पुलिस के अनुसार, यह मामला सिर्फ कागजात में गड़बड़ी का नहीं है, बल्कि सरकारी मुआवजा पाने के लिए मौत की वजह को गलत तरीके से दिखाने से जुड़ा एक संगठित अपराध है। जांच एजेंसियों का मानना है कि जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, इस नेटवर्क से जुड़े और लोगों के नाम सामने आ सकते हैं।
फर्जी पोस्टमार्टम से सरकारी मुआवजे का बड़ा खेल
जांच में पता चला कि कई मामलों में मौत की असली वजह बदलकर उसे सांप के काटने से हुई मौत बता दिया गया। इसके लिए फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार की गईं और उनके आधार पर सरकारी विभागों से 4 लाख का मुआवजा हासिल किया गया। सबसे चौंकाने वाला मामला एक ऐसे व्यक्ति का है जिसने फांसी लगाकर आत्महत्या की थी।आरोप है कि उसकी मौत को भी कागजों में सर्पदंश से हुई मौत दिखा दिया गया और मुआवजे की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। पुलिस का कहना है कि इस मामले में जिस व्यक्ति को लाभार्थी बताया गया, वह भी फर्जी निकला।
16 संदिग्ध मामलों में 3.41 करोड़ की गड़बड़ी
अब तक की जांच में 16 ऐसे संदिग्ध मामले सामने आए हैं, जिनमें मौत की वजहों में कथित तौर पर हेरफेर करके लगभग 3.41 करोड़ का आर्थिक फायदा उठाया गया। पुलिस का कहना है कि यह आंकड़ा शुरुआती जांच पर आधारित है और जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, घोटाले की कुल रकम और मामलों की संख्या बढ़ सकती है।
विधानसभा में उठा मुद्दा, तब खुली परतें
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब बीजेपी विधायक सुशांत शुक्ला ने छत्तीसगढ़ विधानसभा में बिलासपुर जिले में सांप के काटने से हुई मौतों और मुआवजे के आंकड़ों को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि पिछले तीन सालों में अकेले बिलासपुर जिले में सांप के काटने से 431 मौतें दर्ज की गई थीं, जिसके लिए सरकार ने लगभग 17.2 करोड़ का मुआवजा दिया था। इसके बाद, प्रशासन और पुलिस ने रिकॉर्ड की जांच शुरू की, जिसमें कई मामलों में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं।
डॉक्टर, वकील और बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत
बिलासपुर के पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह के अनुसार, जांच में डॉक्टरों, वकीलों, उनके सहयोगियों और बैंक कर्मचारियों के एक संगठित नेटवर्क की भूमिका सामने आई है। पुलिस को सिस्टम के कई स्तरों पर मिलीभगत का शक है—जिसमें दस्तावेजों में हेर-फेर करने से लेकर मुआवजे की रकम निकालने तक की बातें शामिल हैं। जांच एजेंसियां मेडिकल कॉलेजों और स्वास्थ्य संस्थानों द्वारा जारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट की भी बारीकी से जांच कर रही हैं। यह भी देखा जा रहा है कि किन डॉक्टरों ने रिपोर्ट जारी की और किन परिस्थितियों में मौत का कारण दर्ज किया गया।
पुलिस की जांच में यह भी पता चला है कि मुआवजे की रकम लाभार्थियों के बैंक खातों में जमा होने के तुरंत बाद ही निकाल ली गई थी। आरोप है कि बाद में यह पैसा कथित सिंडिकेट के सदस्यों के बीच बांट दिया गया। इस पूरे नेटवर्क में बैंक कर्मचारियों और बिचौलियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
महिला डॉक्टर समेत 17 गिरफ्तार
इस मामले में अब तक 17 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सबसे हालिया गिरफ्तारी डॉ. प्रियंका सोनी की हुई है, जो CIMS से जुड़ी हैं। उन पर फर्जी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार करने का आरोप है। अब जांच का दायरा बिलासपुर तहसील कार्यालय तक बढ़ गया है। नगर निगम के ड्राइवर गोविंद विश्वकर्मा को भी इस नेटवर्क का अहम सदस्य माना जा रहा है। उन्हें दो वकीलों और एक बैंक कर्मचारी के साथ गिरफ्तार किया गया था। वहीं, मामले का एक अन्य मुख्य आरोपी वकील अभी भी फरार है, जिसकी तलाश जारी है।
जांच अभी जारी
पुलिस का कहना है कि अभी जांच चल रही है और कई दूसरे संदिग्ध मामलों से जुड़े दस्तावेजों की बारीकी से जांच की जा रही है। अगर धोखाधड़ी के और मामले सामने आते हैं, तो गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ सकती है। इसके अलावा, अधिकारी इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि क्या इस कथित घोटाले का दायरा सिर्फ बिलासपुर तक ही सीमित था या राज्य के दूसरे जिलों में भी ऐसी ही गड़बड़ियां हुई थीं। (एजेंसी)

