TET अनिवार्यता के विरोध में उत्तराखंड के शिक्षक लामबंद, 22 जून को महाआंदोलन का ऐलान
Dehradun News: उत्तराखंड में, राज्य भर के शिक्षक 22 जून को देहरादून स्थित सचिवालय को घेरने जा रहे हैं। उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ 22 जून को देहरादून के परेड ग्राउंड से सचिवालय तक मार्च निकालेगा और टीईटी की अनिवार्यता को समाप्त करने और पुरानी पेंशन प्रणाली को बहाल करने की मांग करेगा। उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ ने 18 कर्मचारी संगठनों से समर्थन मांगा है, जिनमें से कई राज्यों के शिक्षक संगठनों ने उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ को अपना समर्थन देने का वादा किया है।
उत्तराखंड में शिक्षक लंबे समय से टीईटी परीक्षा से छूट और पुरानी पेंशन बहाल करने के दो मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ के बैनर तले शिक्षकों ने मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर अपनी मांगें रखी हैं। इन मुद्दों का कोई समाधान न निकलने से उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ अब आक्रोशित है। ऐसे में अब आंदोलन करने का फैसला लिया गया है। 22 जून को प्रदेश के सभी विभिन्न जिलों से शिक्षक देहरादून के परेड ग्राउंड इकट्ठा होंगे और अपनी इन दो मांगों को लेकर सचिवालय कूच करेंगे।
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जानिए क्या है पूरा मामला
1. सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश जारी किया है जिसमें सभी शिक्षकों को दो साल के भीतर टीईटी या सीटीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है।
2. इस आदेश में उन शिक्षकों को छूट दी गई है जिनकी सेवानिवृत्ति में पांच साल शेष हैं।
3. लेकिन 55 वर्ष की आयु तक कार्यरत शिक्षकों के लिए दो साल के भीतर टीईटी या सीटीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है।
4. ऐसा न करने पर उन शिक्षकों को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त होना पड़ेगा।
5. शिक्षकों का तर्क है कि 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को इस नियम से छूट मिलनी चाहिए, क्योंकि उस समय तक टीईटी परीक्षा अनिवार्य नहीं थी।
6. दशकों से सेवा कर रहे वरिष्ठ और अनुभवी शिक्षकों पर अब परीक्षा पास करने का दबाव डालना न तो व्यावहारिक है और न ही उचित।
प्राथमिक शिक्षक संघ की प्रांतीय तदर्थ समिति के सदस्य दिगंबर सिंह नेगी ने कहा कि यह अनुचित है क्योंकि टीईटी की अनिवार्यता पूर्व शिक्षकों पर लागू नहीं होती। दिगंबर सिंह नेगी ने बताया कि 1 सितंबर, 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि सभी शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता पूरी करनी होगी। हालांकि, 2011 से पहले टीईटी की अनिवार्यता नहीं थी।
सरकार को हमारी मांगे पूरी करनी होगी
दिगंबर सिंह नेगी ने कहा कि 2011 के बाद शिक्षक बने सभी लोगों ने टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण की थी। नेगी ने आगे कहा कि सरकार ने गुपचुप तरीके से 2017 में आरटीईटी अधिनियम में संशोधन किया और चालाकी से टीईटी को अनिवार्य बना दिया। नेगी ने सवाल उठाया कि नई व्यवस्था को पुरानी व्यवस्था पर कैसे लागू किया जा सकता है। कई शिक्षक कई तरह के शिक्षा के क्षेत्र में पुरस्कार भी ले चुके हैं। पूरे भारत के 25 से 30 लाख शिक्षक इससे प्रभावित हो रहे हैं। उनको कहा जा रहा है कि वह 31 अगस्त 2028 तक सभी टीईटी की अनिवार्यता को पूरा करें। दिगंबर सिंह नेगी ने कहा कि हमसे इस फैसले का पूरा विरोध करते हैं। इसी को लेकर हमारा आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार हमारी मांगे पूरी नहीं करती है।
उत्तराखंड के लगभग 15 हजार शिक्षक होंगे प्रभावित
उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ का कहना है कि टीईटी की अनिवार्यता को समाप्त कर देना चाहिए क्योंकि इससे देशभर में लगभग 25 से 30 लाख शिक्षक और उत्तराखंड में 15,000 से अधिक शिक्षक प्रभावित होते हैं। प्रभावित शिक्षकों में बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक हैं जो 15 से 25 वर्षों या उससे अधिक समय से विद्यालयों में सेवा दे रहे हैं। यही नहीं विभिन्न राष्ट्रीय एवं राज्य प्रशिक्षण भी प्राप्त कर चुके हैं। सालों की संतोषजनक सेवा के बाद नई पात्रता को पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर लागू करना सही नहीं है। ये संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत सामान्य के सिद्धांत और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन जीने के मौलिक अधिकार से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा करता है।
शिक्षक संघ का तर्क है कि नई शैक्षणिक योग्यताएं और पात्रता भविष्य की नियुक्तियों पर लागू होती हैं, मौजूदा कर्मचारियों पर नहीं। यदि बड़ी संख्या में शिक्षकों की सेवाएं प्रभावित होती हैं, तो इसका छात्रों की शिक्षा, स्कूलों के सुचारू संचालन, उनकी सेवा सुरक्षा, पेंशन अधिकारों और उनके परिवारों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।(एजेंसी)

