Share Market में बड़ी गिरावट: Nifty 22800 के करीब; महाराष्ट्र के सूखे से बढ़ी बाजार की चिंता
नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार में सोमवार को भारी बिकवाली देखने को मिली। Nifty और Sensex में तेज गिरावट के बीच निवेशकों की चिंता बढ़ गई। बाजार में कमजोरी के पीछे घरेलू और वैश्विक दोनों कारण बताए जा रहे हैं। कारोबार के दौरान Nifty करीब 300 अंकों की गिरावट के साथ 22,807 के आसपास पहुंच गया, जबकि Sensex भी 1,000 अंकों से ज्यादा टूटकर 73,000 के नीचे चला गया। बाजार में जारी उतार-चढ़ाव के बीच निवेशक अब यह देख रहे हैं कि आने वाले सत्रों में प्रमुख इंडेक्स किस दिशा में जाते हैं।
Nifty के लिए 22,800 का स्तर अहम
टेक्निकल एनालिसिस के लिहाज से 22,800 का स्तर Nifty के लिए महत्वपूर्ण सपोर्ट जोन माना जा रहा है। बाजार विश्लेषकों के अनुसार यदि इंडेक्स इस स्तर के आसपास टिकने में सफल रहता है तो खरीदारी लौट सकती है, लेकिन इसके नीचे कमजोरी बढ़ने पर बाजार में और दबाव दिखाई दे सकता है। Nifty के मौजूदा स्तर की तुलना मई 2024 के स्तरों से भी की जा रही है। इसका मतलब है कि करीब दो साल से अधिक समय के अंतराल के बाद इंडेक्स फिर उसी क्षेत्र के आसपास दिखाई दे रहा है। हालांकि किसी सपोर्ट स्तर का टूटना या बने रहना बाजार की आगे की दिशा की गारंटी नहीं देता। यह केवल तकनीकी विश्लेषण का एक संकेतक है।
ऑल टाइम हाई से करीब 15 फीसदी नीचे Nifty
Nifty इस साल जनवरी में 26,373.20 के स्तर तक पहुंचा था। इसके बाद इंडेक्स में लगातार कमजोरी देखने को मिली और अब यह 22,800 के आसपास कारोबार कर रहा है। इस तरह अपने रिकॉर्ड स्तर से इंडेक्स में करीब 15 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। लगातार गिरावट का असर इक्विटी में निवेश करने वाले निवेशकों के सेंटीमेंट पर भी पड़ा है। डायरेक्ट शेयरों के अलावा म्यूचुअल फंड और ETF में निवेश करने वाले लोग भी बाजार की दिशा को लेकर सतर्क नजर आ रहे हैं।
महाराष्ट्र का सूखा भी बाजार के रडार पर
सोमवार की गिरावट के बीच महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति से जुड़ी खबर ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई। रिपोर्टों के अनुसार राज्य की बड़ी संख्या में तहसीलों को सूखे की श्रेणी में रखा गया है। महाराष्ट्र में सोयाबीन, अरहर, मूंग, उड़द, गन्ना, प्याज, कपास और अन्य कृषि उत्पादों का बड़े स्तर पर उत्पादन होता है। ऐसे में कम बारिश और फसल को नुकसान होने की स्थिति में कृषि जिंसों की कीमतों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। महाराष्ट्र राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भी राज्य में सूखे को कृषि उत्पादकता और जल संसाधनों के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम के रूप में दर्ज करता है।
सोयाबीन से लेकर प्याज तक असर की आशंका
यदि सूखे की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। इसका असर सोयाबीन, दालों, प्याज, कपास और गन्ने जैसी प्रमुख कृषि जिंसों पर पड़ सकता है। इसके अलावा ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ने की आशंका रहती है। पानी और हरे चारे की कमी होने पर पशुपालन की लागत बढ़ सकती है। हालांकि किसी एक राज्य में मौसम या फसल से जुड़ी समस्या का शेयर बाजार पर सीधा और निश्चित असर तय नहीं किया जा सकता। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि फसल उत्पादन, महंगाई, ग्रामीण मांग और कंपनियों की कमाई पर वास्तविक असर कितना पड़ता है।
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अमेरिका-ईरान तनाव से भी बाजार पर दबाव
भारतीय बाजार पहले से ही वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के दबाव में है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा पश्चिम एशिया में बढ़ती अनिश्चितता ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई है। अगर क्षेत्रीय तनाव के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होती है तो इसका असर कच्चे तेल सहित कई कमोडिटी की कीमतों पर पड़ सकता है। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है।
Crude Oil की कीमतों पर नजर
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के साथ कच्चे तेल की कीमतें भी बाजार के लिए बड़ा जोखिम बन गई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड के 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जाने की स्थिति भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए क्रूड महंगा होने पर आयात बिल, महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि शेयर बाजार में तेल की कीमतों में होने वाली हर बड़ी हलचल पर निवेशकों की नजर रहती है।
FIIs की बिकवाली ने बढ़ाई परेशानी
बाजार में गिरावट का एक अन्य कारण Foreign Institutional Investors यानी FIIs की गतिविधियां भी हैं। वैश्विक अनिश्चितता, डॉलर की मजबूती और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बदलाव जैसी परिस्थितियों में विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं। अगर विदेशी निवेश की निकासी बढ़ती है तो इसका असर भारतीय इक्विटी बाजार पर भी दिखाई दे सकता है। हालांकि बाजार की दिशा केवल FII खरीद-बिक्री से तय नहीं होती। घरेलू संस्थागत निवेश, कंपनियों के नतीजे, ब्याज दरें, महंगाई और आर्थिक विकास जैसे कई दूसरे कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं।
US Fed की नीति भी अहम
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों और महंगाई को लेकर रुख का असर दुनियाभर के बाजारों पर पड़ता है। अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहने पर डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड जैसे एसेट्स निवेशकों के लिए आकर्षक हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में उभरते बाजारों से पूंजी के प्रवाह पर दबाव बन सकता है। भारतीय शेयर बाजार भी इस वैश्विक पूंजी प्रवाह से प्रभावित होता है।
Banking, Auto और Midcap-Smallcap शेयरों पर दबाव
बाजार में व्यापक बिकवाली के दौरान सिर्फ Nifty और Sensex ही नहीं, बल्कि अलग-अलग सेक्टर के शेयर भी प्रभावित होते हैं। Banking, Auto और Midcap-Smallcap शेयरों में बिकवाली बढ़ने पर बाजार की कमजोरी और व्यापक दिखाई देती है। ऐसे समय में Volatility Index यानी India VIX में तेजी निवेशकों के बढ़ते जोखिम-बोध का संकेत दे सकती है।
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निवेशकों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल क्या?
लगातार गिरावट के बीच निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल बाजार की अगली दिशा को लेकर है। लेकिन बाजार के किसी एक स्तर या एक खबर के आधार पर यह तय करना मुश्किल है कि गिरावट कब रुकेगी। फिलहाल निवेशकों की नजर कुछ प्रमुख संकेतकों पर रहेगी—Nifty का 22,800 के आसपास व्यवहार, कच्चे तेल की कीमत, विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री, अमेरिकी बाजारों के संकेत, रुपये की चाल और घरेलू आर्थिक आंकड़े। बाजार में गिरावट के दौर में निवेशकों के लिए जोखिम को समझना और अपनी निवेश रणनीति को अपने वित्तीय लक्ष्य व जोखिम क्षमता के अनुरूप रखना महत्वपूर्ण होता है।
आगे बाजार के लिए कौन-कौन से फैक्टर अहम?
आने वाले दिनों में भारतीय शेयर बाजार की दिशा कई घरेलू और वैश्विक कारकों से प्रभावित हो सकती है। इनमें पश्चिम एशिया की स्थिति, क्रूड ऑयल, अमेरिकी मौद्रिक नीति, विदेशी निवेशकों का रुख, मानसून और कृषि उत्पादन से जुड़े आंकड़े प्रमुख हैं। ऐसे में Nifty के महत्वपूर्ण तकनीकी स्तरों के साथ-साथ कंपनियों की कमाई और अर्थव्यवस्था से जुड़े वास्तविक आंकड़ों पर नजर रखना भी जरूरी होगा।

