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बेरोजगारी का नया आंकड़ा : छत्तीसगढ़ में दर सिर्फ 2.3%, राष्ट्रीय औसत से काफी कम

बेरोजगारी का नया आंकड़ा

भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 की रिपोर्ट ने रोजगार को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी दर 2.3 प्रतिशत दर्ज की गई है। वहीं मध्य प्रदेश में यह 1.5 प्रतिशत और गुजरात में 0.9 प्रतिशत बताई गई है। इन आंकड़ों को देखकर पहली नजर में लग सकता है कि इन राज्यों में लगभग सभी लोगों के पास रोजगार उपलब्ध है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि तस्वीर इतनी सीधी नहीं है।

बेरोजगारी दर कैसे तय होती है?

अधिकांश लोग मानते हैं कि बेरोजगारी दर का मतलब कुल आबादी में बेरोजगार लोगों का प्रतिशत होता है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। बेरोजगारी दर केवल उन लोगों की संख्या बताती है जो काम करना चाहते हैं, नौकरी की तलाश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें रोजगार नहीं मिल रहा।

यानी जो लोग किसी भी कारण से नौकरी ढूंढना छोड़ चुके हैं या जो छोटे-मोटे काम में लगे हुए हैं, वे बेरोजगार की श्रेणी में नहीं आते। यही वजह है कि कई बार जमीनी हालात कठिन होने के बावजूद बेरोजगारी दर कम दिखाई देती है।

ग्रामीण इलाकों में क्यों कम दिखती है बेरोजगारी?

रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर केवल 1.8 प्रतिशत है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 5.7 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। यह अंतर बताता है कि गांवों और शहरों की रोजगार स्थिति अलग-अलग है। ग्रामीण इलाकों में लोग खेती, मजदूरी, पशुपालन या छोटे स्वरोजगार से जुड़े रहते हैं। कई बार परिवार के खेत में कुछ घंटे काम करने वाले व्यक्ति को भी रोजगारशुदा मान लिया जाता है। भले ही उसकी आय बेहद कम क्यों न हो। दूसरी ओर, शहरों में शिक्षित युवा बेहतर नौकरी की तलाश में लंबे समय तक इंतजार करते हैं। इसलिए शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर ज्यादा दिखाई देती है।

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‘रोजगार’ और ‘अच्छी नौकरी’ में बड़ा फर्क

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी व्यक्ति के काम करने का मतलब यह नहीं कि उसके पास स्थायी या अच्छी आय वाला रोजगार है। देश के कई राज्यों में बड़ी संख्या में लोग दिहाड़ी मजदूरी, ठेला-खुमचा, अस्थायी काम या छोटे स्वरोजगार से जुड़े हैं। इन्हें भी रोजगार की श्रेणी में गिना जाता है। इसी वजह से कम बेरोजगारी दर के बावजूद आर्थिक असुरक्षा बनी रहती है। इसे “अल्प-रोजगार” और “प्रच्छन्न बेरोजगारी” कहा जाता है। यानी व्यक्ति काम तो कर रहा है, लेकिन उसकी आय और रोजगार की गुणवत्ता पर्याप्त नहीं है।

महिलाओं के आंकड़े भी पूरी तस्वीर नहीं दिखाते

PLFS रिपोर्ट के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में महिलाओं की बेरोजगारी दर पुरुषों की तुलना में कम है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण महिलाओं का बड़ा हिस्सा खेती और घरेलू कार्यों में लगा रहता है, जिन्हें रोजगार की श्रेणी में शामिल कर लिया जाता है। हालांकि इन कामों से मिलने वाली आय सीमित होती है और औपचारिक नौकरी में महिलाओं की भागीदारी अभी भी कम बनी हुई है।

गुजरात मॉडल और रोजगार की हकीकत

रिपोर्ट में गुजरात की बेरोजगारी दर सबसे कम बताई गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, वहां उद्योग और विनिर्माण क्षेत्र मजबूत होने से लोगों को काम अपेक्षाकृत जल्दी मिल जाता है। लेकिन वहां भी बड़ी संख्या में लोग असंगठित क्षेत्र में कम वेतन पर काम कर रहे हैं। इसलिए कम बेरोजगारी दर का मतलब यह नहीं कि सभी के पास सुरक्षित और उच्च गुणवत्ता वाली नौकरी है।

क्या कम बेरोजगारी मजबूरी की निशानी है?

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि गरीब और कृषि आधारित राज्यों में लोग लंबे समय तक बेरोजगार नहीं रह सकते। आर्थिक दबाव के कारण वे जो भी काम मिलता है, उसे करने लगते हैं। चाहे वह कम मजदूरी वाला काम ही क्यों न हो।

सिर्फ आंकड़े नहीं, रोजगार की गुणवत्ता भी जरूरी

PLFS रिपोर्ट यह जरूर दिखाती है कि छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में लोग किसी न किसी तरह के काम से जुड़े हुए हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल रोजगार की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह भी है कि लोगों को स्थायी, सुरक्षित और अच्छी आय वाला रोजगार मिले। तभी बेरोजगारी के आंकड़ों का वास्तविक अर्थ समझा जा सकेगा और आर्थिक विकास का सही आकलन हो पाएगा।

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