बांग्लादेश में सूफी मजारों पर कट्टरपंथियों के हमले तेज, 6 महीने में 6 दरगाहों को बनाया निशाना
रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, मजारों पर हमले, आगजनी और श्रद्धालुओं पर हिंसा के मामले बढ़े, सूफी समुदाय में बढ़ी चिंता
Dhaka. बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरता को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष जनवरी से जून के बीच देशभर में कई सूफी मजारों और दरगाहों को कट्टरपंथी समूहों ने निशाना बनाया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन घटनाओं ने सूफी समुदाय के बीच सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
ढाका स्थित इस्लामिक सूफी संगठन “मकान: सेंटर फॉर सूफी हेरिटेज” की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 जनवरी से 30 जून 2026 के बीच बांग्लादेश में कम से कम छह सूफी मजारों पर हमले हुए। इन घटनाओं में तोड़फोड़, आगजनी और श्रद्धालुओं पर हिंसा जैसी घटनाएं शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में कुश्तिया जिले में स्थित पीर अब्दुर रहमान की मजार पर करीब 300 लोगों की भीड़ ने हमला कर आगजनी की। वहीं मार्च में सिलहट स्थित हजरत इब्राहिम शाह की मजार पर उर्स के दौरान एकत्र श्रद्धालुओं पर लगभग 100 लोगों ने हमला किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि हमलावरों ने उर्स समारोह में बज रहे संगीत का विरोध करते हुए यह हमला किया।
इसके अलावा ढाका के मीरपुर स्थित शाह अली बगदादी मजार, कुश्तिया की हजरत शाह दरगाह शरीफ, बरिशाल की हबीब शाह दरबार शरीफ और चटग्राम की हजरत लाल मिया शाह मजार पर भी कथित हमलों और तोड़फोड़ की घटनाओं का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सूफी स्थलों पर हमलों की यह प्रवृत्ति नई नहीं है। इसमें दावा किया गया है कि पूर्व अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान भी बड़ी संख्या में मजारों को निशाना बनाया गया था, जिनमें कई लोगों की मौत और सैकड़ों के घायल होने की बात कही गई है। रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
इन घटनाओं के बीच सूफी और बाउल संगीत से जुड़े कलाकारों ने भी अपनी चिंता व्यक्त की है। बाउल कलाकार नुपुर नादिया के अनुसार, पहले उन्हें हर महीने कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रस्तुति का अवसर मिलता था, लेकिन अब ऐसे कार्यक्रम लगभग बंद हो गए हैं। उनका कहना है कि कट्टरपंथी समूह बाउल संगीत को गैर-इस्लामिक मानते हैं, जिससे कलाकारों में भय का माहौल है।
रिपोर्ट के बाद बांग्लादेश में धार्मिक सहिष्णुता, अल्पसंख्यकों और सूफी समुदाय की सुरक्षा को लेकर फिर बहस तेज हो गई है। हालांकि इन दावों पर बांग्लादेश सरकार की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

