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60 साल पुराना विवाद खत्म! भाखड़ा समझौते पर बनी सहमति, हिमाचल को क्या देंगे पंजाब और हरियाणा?

नई दिल्ली:भाखड़ा और ब्यास नदी विवाद पिछले 60 वर्षों से हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बीच चल रहा है। इसे देश के सबसे पुराने और सबसे जटिल अंतरराज्यीय विवादों में से एक माना जाता है। हालांकि, 1944 से चले आ रहे इस मामले को अब सर्वोच्च न्यायालय ने सुलझा दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। पंजाब और हरियाणा अगले 20 वर्षों में संयुक्त रूप से हिमाचल प्रदेश को कुल 11,973 मिलियन यूनिट बिजली की आपूर्ति करेंगे। यह बिजली नकद में नहीं बल्कि ऊर्जा के रूप में प्रदान की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी. मोहन भी पीठ में शामिल थे, जहां अदालत ने केंद्र सरकार के नकद रहित निपटान प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसे अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरामानी के नेतृत्व में तीनों राज्यों के साथ चर्चा के बाद तैयार किया गया था।

1944 से चल रहा था यह विवाद

इन तीनों राज्यों के बीच विवाद स्वतंत्रता से पहले, यानी 1944 से ही चल रहा था। दरअसल, 1944 में ही सतलुज नदी पर भाखरा-नांगल जलविद्युत योजना का प्रस्ताव रखा गया था। बाद में ब्यास नदी पर देहर और पोंग बांध परियोजनाएं बनाई गईं। इन बांधों के लिए हिमाचल प्रदेश से हजारों एकड़ जमीन ली गई, लेकिन बिजली वितरण के समय हिमाचल प्रदेश को उसके अधिकार से वंचित कर दिया गया। 1 नवंबर, 1966 को पंजाब पुनर्गठन अधिनियम लागू हुआ, जिसके तहत अविभाजित पंजाब से पंजाब और हरियाणा का गठन हुआ, चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश बना और एक बड़ा क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में शामिल किया गया। इसी अधिनियम की धारा 78 के तहत भाखड़ा-नांगल और ब्यास प्रोजेक्ट के अधिकारों और देनदारियों का बंटवारा होना था। हिमाचल प्रदेश उसी समय से इस पर अपना दावा कर रहा था, क्योंकि प्रोजेक्ट के लिए जमीन और संसाधन उसके इलाके लिए गए थे। ऐसे में वह लंबे से बिजली की मांग कर रहा था। लेकिन पंजाब और हरियाणा की तरफ से यह मांग मानी नहीं जा रही थी।

2011 में पहली बार आया बड़ा फैसला

इस विवाद में पहला बड़ा फैसला 2011 में आया। हिमाचल प्रदेश ने अनुच्छेद 131 के तहत 1996 में सर्वोच्च न्यायालय में मूल मुकदमा दायर किया था। 27 सितंबर, 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश के पक्ष में फैसला सुनाया। न्यायालय ने कहा कि हिमाचल प्रदेश को अविभाजित पंजाब की बिजली का 7.19 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा, जो भाखरा परियोजना के लिए 1 नवंबर, 1966 से, देहर परियोजना के लिए नवंबर 1977 से और पोंग बांध के लिए जनवरी 1978 से प्रभावी होगा। इसी फैसले में पंजाब का हिस्सा 51.80 प्रतिशत हरियाणा का 37.51 प्रतिशत और चंडीगढ़ का हिस्सा 3.50 प्रतिशत सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय किया गया था। राजस्थान का हिस्सा इसलिए नहीं बदला गया, क्योंकि वह कभी अविभाजित पंजाब का हिस्सा नहीं था, राजस्थान एक अलग राज्य था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद भी, 2011 का निर्णय केवल कागजों तक ही सीमित रहा। 2011 के बाद, हिमाचल प्रदेश को उसका 7.19 प्रतिशत हिस्सा मिलना शुरू हो गया, लेकिन उसे 1966 से अक्टूबर 2011 तक की बकाया राशि कभी नहीं मिली। हिमाचल प्रदेश लगातार इस राशि पर अपने अधिकार का दावा करता रहा है, जिसके कारण पिछले 15 वर्षों से यह विवाद जारी है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार, हिमाचल प्रदेश की कुल बकाया राशि 13,066 मिलियन यूनिट है।जिसमें पंजाब और हरियाणा के बीच इस बकाये का 420.77 करोड़ रुपये बना था। यह पैसा डैम बनाने के समय पंजाब और हरियाणा ने कैपिटल कॉस्ट और लोन सर्विसिंग के रूप में खर्च किया था। इसमें पंजाब का हिस्सा 249.23 करोड़ और हरियाणा का 171.55 करोड़ रुपये माना गया। इस एडजस्टमेंट के बाद हिमाचल को मिलने वाली बिजली 11,973 मिलियन यूनिट रह गई।

20 साल के लिए समझौता

अब, सर्वोच्च न्यायालय ने इस समझौते को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत पंजाब और हरियाणा अगले 20 वर्षों तक हिमाचल प्रदेश को उसका हिस्सा प्रदान करेंगे। न्यायालय ने कहा कि यह बिजली अक्टूबर से मार्च के बीच, यानी 20 वर्षों की अवधि में, कम मांग वाले मौसम के दौरान आपूर्ति की जाएगी, जिससे हिमाचल प्रदेश को प्रतिवर्ष 598 मिलियन यूनिट बिजली प्राप्त होगी। भाखरा-नांगल परियोजना के लिए पंजाब और हरियाणा का अनुपात 58:42 होगा और ब्यास परियोजना के लिए 60:40 होगा। हिमाचल प्रदेश को भाखरा ब्यास प्रबंधन बोर्ड को प्रति वर्ष प्राप्त बिजली के लिए एक निश्चित परिचालन शुल्क भी देना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की वित्तीय स्थिति को देखते हुए 20 साल का बीच का रास्ता चुना, जिसमें अदालत ने साफ कहा कि 2011 की डिक्री 15 साल बाद भी लागू नहीं हुई, यह ठीक नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि डिक्री की उम्मीद को जजमेंट डेटर की अनिच्छा की वजह से बेकार नहीं किया जा सकता।

इस तरह, पिछले 60 वर्षों से चला आ रहा यह विवाद अब समाप्त हो गया है। हिमाचल प्रदेश को बिजली का उसका हिस्सा मिलेगा, वहीं हरियाणा और पंजाब पर भी एक साथ बोझ नहीं पड़ेगा। हिमाचल प्रदेश को 20 वर्षों तक सर्दियों के दौरान अतिरिक्त बिजली मिलेगी। हिमाचल प्रदेश इस बिजली का उपयोग अपने लोगों के लिए कर सकेगा या इसे बेचकर राजस्व अर्जित कर सकेगा। पंजाब और हरियाणा को भी नकद भुगतान नहीं करना पड़ेगा; बकाया राशि का भुगतान बिजली के रूप में किश्तों में किया जा सकता है। (एजेंसी)

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