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4 हिस्सों को जोड़कर बना था ‘भारत का दिल’, दिलचस्प है 71 साल के सफर की दास्तान

भोपाल। 1 नवंबर 2026 को भारत का भौगोलिक और सांस्कृतिक हृदय ‘मध्य प्रदेश’ अपनी स्थापना के 71 वर्ष पूरे कर रहा है। आज देश के सबसे तेजी से बढ़ते राज्यों में शुमार मध्य प्रदेश का अस्तित्व में आना कोई सामान्य प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि इसके पीछे लंबी कूटनीतिक चर्चाएं, राजनीतिक असहमति और कई दिलचस्प ऐतिहासिक मोड़ शामिल रहे हैं।

चार अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों को एक सूत्र में पिरोकर तैयार किए गए इस सूबे ने पिछले सात दशकों में न केवल औद्योगिक और कृषि क्रांति की इबारत लिखी, बल्कि अपनी पहचान एक आत्मनिर्भर राज्य के रूप में स्थापित की।

चार टुकड़ों में बंटा था क्षेत्र, ऐसे तैयार हुआ एकीकृत नक्शा

स्वतंत्रता के बाद लागू हुई संविधान व्यवस्था के तहत वर्तमान मध्य प्रदेश चार अलग-अलग भागों में विभाजित था:

सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार (पार्ट-A): नागपुर इसकी राजधानी थी, जिसमें आज का विदर्भ, महाकौशल और छत्तीसगढ़ शामिल थे।

मध्य भारत (पार्ट-B): ग्वालियर और इंदौर रियासतों के विलय से बना यह क्षेत्र छह महीने ग्वालियर और छह महीने इंदौर से संचालित होता था।

विंध्य प्रदेश (पार्ट-C): रीवा राजधानी के साथ बघेलखंड और बुंदेलखंड का भूभाग इसमें शामिल था।

भोपाल स्टेट: नवाब हमीदुल्लाह खान के शासन वाली स्वतंत्र रियासत, जिसका भारत में विलय काफी संघर्ष के बाद जून 1949 में संभव हुआ था।

अक्टूबर 1953 में गठित न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता वाले राज्य पुनर्गठन आयोग ने भाषाई आधार पर सीमाओं का निर्धारण किया। नागपुर और मराठी भाषी विदर्भ को बॉम्बे राज्य में भेजा गया, जबकि हिंदी भाषी महाकौशल, मध्य भारत, विंध्य और भोपाल को मिलाकर एक नए विशाल राज्य की रूपरेखा रखी गई।

जब नक्शा देखकर नेहरू बोले- ‘यह कैसा बेढंगा प्रदेश है?’

मध्य भारत के तत्कालीन मुख्यमंत्री लीलाधर जोशी के संस्मरणों के अनुसार, जब प्रस्तावित नए राज्य का नक्शा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने प्रस्तुत किया गया, तो उनका पहला उद्गार था: ‘अरे! यह क्या अजूबा है? ऐसा लंबा-चौड़ा और बेढंगा प्रदेश कैसे बन सकता है?’

नेहरू की हिचकिचाहट और संशय को समाप्त करने के लिए राज्य के नेताओं ने जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. वी.के.आर.वी. राव की मदद ली। प्रो. राव ने प्राकृतिक संसाधनों, खनिजों और कृषि क्षमता का गहराई से अध्ययन कर एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अंग्रेजी अखबार में लेख लिखा ‘इकोनॉमिक वायबिलिटी ऑफ मध्य प्रदेश’। इस विश्लेषणात्मक लेख के बाद दिल्ली में प्रेस वार्ता आयोजित की गई, जिसने केंद्र सरकार को इस नए प्रदेश की आर्थिक स्थिरता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त कर दिया।

जबलपुर के हाथ से फिसलकर भोपाल कैसे पहुंचा ताज?

नए राज्य की राजधानी को लेकर सबसे कड़ा मुकाबला जबलपुर, इंदौर, ग्वालियर और भोपाल के बीच था। राज्य पुनर्गठन आयोग ने अपनी औपचारिक रिपोर्ट में संस्कारधानी जबलपुर को राजधानी बनाने की सिफारिश तक कर दी थी, जिससे वहां तैयारियां भी आरंभ हो गई थीं।

हालांकि, आखिरी समय में निर्णय भोपाल के पक्ष में मुड़ गया। इसके दो मुख्य कारण थे:

प्रशासनिक ढांचा: भोपाल में सरकारी दफ्तरों और मंत्रियों के बैठने के लिए ‘मिंटो हॉल’ जैसी विशाल और तैयार इमारतें पहले से मौजूद थीं, जबकि जबलपुर में नए निर्माण की जरूरत पड़ती।

सामरिक रणनीति: भोपाल रियासत का भारत संघ में विलय काफी खींचतान के बाद हुआ था। सरदार वल्लभभाई पटेल और मौलाना अबुल कलाम आजाद की सोच थी कि इस पूर्व नवाब रियासत पर सीधी प्रशासनिक निगरानी रखने के लिए इसे राजधानी बनाना सामरिक दृष्टि से अधिक सुरक्षित रहेगा।

राजधानी गंवाने की भरपाई के तौर पर जबलपुर को राज्य का उच्च न्यायालय (High Court) प्रदान किया गया।

दीपावली की रात, अमावस्या और दीयों का उजाला

संसद से विधेयक पास होने के बाद 31 अक्टूबर 1956 की मध्यरात्रि भोपाल के मिंटो हॉल में शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन हुआ। उस रात अमावस्या थी और पूरे देश में दीपावली मनाई जा रही थी।

समारोह के दौरान जब किसी ने अमावस्या की रात का हवाला दिया, तो पहले मनोनीत मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल ने मुस्कुराते हुए कहा ‘‘पर इस अंधेरे को मिटाने के लिए हजारों दीये तो जल रहे हैं।’’ मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद हिदायतुल्ला ने पहले राज्यपाल डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को और फिर राज्यपाल ने पंडित शुक्ल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। 17 दिसंबर 1956 को 328 विधायकों के साथ राज्य की पहली विधानसभा बैठी।

विभाजन का दर्द और आधुनिक विकास की उड़ान

1 नवंबर 2000 को 44 वर्षों की यात्रा के बाद प्रशासनिक कारणों से छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा दिया गया, जिससे मध्य प्रदेश ने अपना करीब 30% भूभाग और 27% राजस्व खो दिया।

इस बड़े विभाजन के बावजूद मध्य प्रदेश थमा नहीं। कभी ‘बीमारू’ श्रेणी में रहने वाला यह राज्य आज शरबती गेहूं, सोयाबीन और दलहन उत्पादन में देश का अव्वल राज्य बन चुका है और लगातार कृषि कर्मण पुरस्कार जीत रहा है। वहीं, राज्य की व्यावसायिक राजधानी इंदौर लगातार कई वर्षों से देश का सबसे स्वच्छ शहर बनकर विश्व पटल पर मध्य प्रदेश का नाम रोशन कर रही है।

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