धर्मांतरण कानून पर सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई, छत्तीसगढ़ सरकार के कानून को चुनौती
CG News: सुप्रीम कोर्ट छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है। ईसाई आदिवासी महासभा ने छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 के प्रावधानों को चुनौती देते हुए तर्क दिया है कि यह कानून धार्मिक गतिविधियों पर मनमानी पाबंदियां लगाता है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अधिकारी इस कानून के तहत रविवार को होने वाली चर्च प्रार्थना सभाओं पर भी कार्रवाई कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले में उच्च न्यायालय का निर्णय भी सहायक हो सकता है। उन्होंने उल्लेख किया कि कुछ याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में भी याचिका दायर की है। इसलिए, यदि सर्वोच्च न्यायालय सीधे मामले की सुनवाई शुरू करता है, तो उच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई प्रभावित हो सकती है। मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा कि यदि उच्च न्यायालय निर्धारित समय सीमा के भीतर मामले की सुनवाई कर लेता है, तो उसका निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के लिए भी सहायक होगा।
याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील कॉलिन ने बताया कि इस मुद्दे पर सात याचिकाएं हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि उच्च न्यायालय में लंबित मामलों को भी सर्वोच्च न्यायालय में लाया जा सकता है और सभी मामलों को संभालने के लिए एक वकील नियुक्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वे अन्य याचिकाकर्ताओं से बात करेंगे और वे मामले को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए याचिका दायर कर सकते हैं।
वकील ने कानून की भाषा को व्यापक बताते हुए कहा कि इसका असर दूर तक हो सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने मामले में नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। साथ ही रजिस्ट्री से कहा कि इसी मुद्दे पर दाखिल सभी मामलों की जानकारी जुटाई जाए।
कानून को हाई कोर्ट में भी दी गई है चुनौती
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने मार्च 2026 में छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 पारित किया। अप्रैल में राज्यपाल की सहमति मिलने के बाद, इसने 1968 से लागू एक पुराने कानून का स्थान ले लिया। इसके प्रावधानों को भी चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। उनका आरोप है कि स्वैच्छिक धर्मांतरण में भी सार्वजनिक प्रकटीकरण और सरकारी स्वीकृति सहित कई प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।
याचिका में धर्मांतरण कराने वाले पुजारियों और अन्य धार्मिक नेताओं के पंजीकरण संबंधी आवश्यकताओं पर भी सवाल उठाया गया है। कानून में कुछ अपराधों के लिए न्यूनतम सात साल की कैद, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल धार्मिक स्थलों को बंद करने और लोगों के पूजा-पाठ और धार्मिक सभाओं के अधिकार में बाधा डालने के लिए किया जा रहा है। इस मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 8 अक्टूबर को राज्य सरकार को तीन हफ्ते के भीतर जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया था। (एजेंसी)

