RBI फिर बढ़ाएगा ब्याज दरें? रेपो रेट पर MPC में एकमत नहीं, फैसले को लेकर बढ़ी हलचल
मुंबई: महंगाई पर काबू पाने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को ब्याज दरों में और बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है; हालांकि, ऐसा बहुत तेजी से करने पर देश की आर्थिक विकास दर पर दबाव पड़ सकता है। बुधवार को जारी मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के मिनट्स (कार्यवृत्त) से यह संकेत मिलता है। इस महीने की शुरुआत में, RBI ने लगभग चार वर्षों में पहली बार रेपो रेट में बढ़ोतरी की थी। अब, महंगाई का दबाव बढ़ने के बीच यह सवाल उठता है कि क्या आने वाले महीनों में आम आदमी के लिए कर्ज लेना और भी महंगा हो सकता है?
रेपो रेट बढ़कर 5.50% पर पहुंचा
RBI की मौद्रिक नीति समिति ने इस महीने सर्वसम्मति से रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी की है, जिससे यह दर 5.50% हो गई है। इसके साथ ही, केंद्रीय बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति के रुख को ‘तटस्थ’ (न्यूट्रल) से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (सोच-समझकर सख्ती) कर दिया है। इससे संकेत मिलता है कि महंगाई को काबू में करने के लिए आगे और भी सख्त कदम उठाए जा सकते हैं, और निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम है।
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर RBI बैंकों को पैसा उधार देता है। इस दर में बढ़ोतरी से बैंकों के लिए उधार लेना महंगा हो सकता है। इसका असर होम लोन, कार लोन और अन्य तरह के कर्ज की ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, ग्राहकों के लोन की ब्याज दरों में कब और कितना बदलाव होगा, यह बैंकों के फैसलों और लोन की शर्तों पर निर्भर करता है।
महंगाई क्यों बढ़ा रही RBI की चिंता?
RBI के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को काबू में रखना है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और मानसून में कम बारिश के कारण खाद्य महंगाई का दबाव बढ़ गया है। इससे आम जनता के घरेलू बजट और केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति, दोनों को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं। सितंबर 2026 में, भारत की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54% हो गई। यह आंकड़ा बाजार के अनुमानों से अधिक था और RBI की 6% की ऊपरी सीमा के करीब पहुंच गया।
केंद्रीय बैंक ने अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के लिए 6% की औसत मुद्रास्फीति दर का अनुमान लगाया है। वहीं, पूरे वित्तीय वर्ष के लिए मुद्रास्फीति का अनुमान 5% से बढ़ाकर 5.2% कर दिया गया है। MPC की बैठक के विवरण के अनुसार, समिति के कई सदस्यों ने चिंता जताई कि मुद्रास्फीति का दबाव अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में भी फैल सकता है। उनका मानना था कि कीमतों में हो रही वृद्धि को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाए, उससे पहले ही जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए।
आगे ब्याज दरें बढ़ाने के पक्ष में कौन?
RBI की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने संकेत दिया कि महंगाई को काबू में रखने के लिए पॉलिसी ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महंगाई की उम्मीदों को और बढ़ने से रोकने के लिए समय रहते कदम उठाना जरूरी है। वहीं, MPC सदस्य सौगत भट्टाचार्य ने भी सख्त मौद्रिक नीति (tight monetary policy) बनाए रखने का समर्थन किया।
हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ब्याज दरों को बहुत तेज़ी से बढ़ाया गया, तो इससे आर्थिक विकास की गति पर असर पड़ सकता है। RBI के कार्यकारी निदेशक इंद्रनील भट्टाचार्य ने भी महंगाई को नियंत्रित करने के लिए पहले से सक्रिय कदम उठाने का समर्थन किया। उनका मानना था कि कीमतों के दबाव के और बढ़ने के संकेतों का इंतजार करने के बजाय, समय रहते कदम उठाना बेहतर होगा।
रेपो रेट बढ़ाने की रफ्तार पर सर्वसम्मति नहीं
महंगाई को लेकर चिंताओं के बावजूद, मौद्रिक नीति समिति (MPC) के सभी सदस्य ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी के पक्ष में नहीं हैं। समिति के सदस्य नागेश कुमार और राम सिंह ने मौद्रिक नीति के रुख को ‘तटस्थ’ (न्यूट्रल) से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (सोच-समझकर सख्ती) करने के फैसले का विरोध किया। राम सिंह ने चेतावनी दी कि नीतिगत रुख में इस बदलाव को लंबे समय तक ब्याज दरें बढ़ाने के संकेत के रूप में देखा जा सकता है—एक ऐसा कदम जिसके लिए फिलहाल कोई ठोस आधार नजर नहीं आता।
उन्होंने लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें बनाए रखने के बजाय, जरूरत के हिसाब से छोटी और धीरे-धीरे ब्याज दरें बढ़ाने का समर्थन किया। उनका मानना था कि बहुत तेजी से ब्याज दरें बढ़ाने से उपभोक्ताओं की मांग कम हो सकती है—और इसका असर उन क्षेत्रों तक भी पहुंच सकता है, जो सीधे तौर पर ब्याज दरों से प्रभावित नहीं होते। दूसरे शब्दों में, हालांकि महंगाई को काबू में करने के लिए कड़े कदम उठाना जरूरी हो सकता है, लेकिन इन कदमों को लागू करने की गति तय करते समय आर्थिक विकास पर पड़ने वाले इनके संभावित असर को भी ध्यान में रखना चाहिए।
महंगाई के बावजूद GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ा
दिलचस्प बात यह है कि RBI ने अपने महंगाई के अनुमान को बढ़ाने के साथ-साथ देश की आर्थिक विकास दर के अनुमान में भी बढ़ोतरी की है। अपनी हालिया मौद्रिक नीति समीक्षा में, केंद्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए आर्थिक विकास के अनुमान को 40 आधार अंक बढ़ाकर 7.1% कर दिया है। इससे पता चलता है कि RBI को आर्थिक गतिविधियों के मजबूत होने की उम्मीद है, हालांकि बढ़ती महंगाई से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ब्याज दरें ज्यादा बढ़ने से कर्ज की लागत बढ़ सकती है और घरों तथा कंपनियों के खर्च और निवेश पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, अगर महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है, तो लोगों की खरीदारी की क्षमता कमजोर हो सकती है।
आम लोगों के लिए क्या है इसका मतलब?
फिलहाल रेपो रेट 5.50% है, और RBI के संशोधित नीतिगत रुख ने निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों को कम कर दिया है। अगर रेपो रेट और बढ़ता है, तो होम लोन और कार लोन जैसे कर्ज महंगे हो सकते हैं। हालांकि, इसका सीधा असर इस बात पर निर्भर करेगा कि RBI कब और कितनी दर बढ़ाता है, और बैंक अपनी ब्याज दरों में कितना बदलाव करते हैं। फिलहाल केंद्रीय बैंक के सामने दोहरी चुनौती है। उसे महंगाई पर काबू पाने के लिए जरूरत के मुताबिक सख्ती करनी है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि ब्याज दरों में बहुत तेज बढ़ोतरी से आर्थिक विकास की रफ्तार कमजोर न पड़े। (एजेंसी)

