‘SC के आदेश को खिलौना समझ लिया?’ छात्र से ₹5 लाख का बांड मांगने पर भड़के चीफ जस्टिस, कार्यपालक मजिस्ट्रेट की बढ़ी मुश्किलें!
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (GBU) के एक छात्र को निजी मुचलका भरने का नोटिस थमाने के मामले में शीर्ष अदालत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने ग्रेटर नोएडा के कार्यपालक मजिस्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत के आदेशों की अनदेखी किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदालत ने मामले को रिकॉर्ड पर लाने के निर्देश देते हुए संबंधित अधिकारी से औपचारिक जवाब तलब करने की बात कही है।
रोक के बावजूद छात्र को 5 लाख के बांड का फरमान
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने उठाया। उन्होंने पीठ को अवगत कराया कि विश्वविद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी को ग्रेटर नोएडा के कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 135 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
नोटिस में छात्र से पूछा गया था कि शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए उससे 5 लाख रुपये का व्यक्तिगत मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानतदार क्यों न लिए जाएं। वरिष्ठ वकील ने अदालत को याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही छात्र प्रदर्शनों से संबंधित एफआईआर को निरस्त कर चुका है और छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर स्पष्ट रोक लगा रखी है।
पुलिस रिपोर्ट और प्रदर्शन में उकसाने का आरोप
4 सितंबर 2026 को जारी इस नोटिस का आधार एक स्थानीय पुलिस रिपोर्ट थी। पुलिस ने आरोप लगाया था कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहे हैं। इसके साथ ही उन पर आरोप लगाया गया कि वे छात्रों को ‘कॉकरेच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के धरने में शामिल होने के लिए भड़का रहे हैं, जिससे इलाके में तनाव और शांति भंग होने का खतरा पैदा हुआ। इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर मजिस्ट्रेट ने छात्र के खिलाफ शांति भंग की धाराओं में प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
मीडिया में खबर आने पर नोटिस वापस, कोर्ट बोला-अवमानना खत्म नहीं हुई
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि मामला मीडिया में आने के बाद प्रशासन ने आनन-फानन में यह नोटिस वापस ले लिया। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया कि नोटिस वापस होने के बाद अब क्या आधार बचता है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने जवाब दिया कि महज नोटिस वापस ले लेने से अदालत के आदेश की अवहेलना का दोष खत्म नहीं हो जाता, क्योंकि यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के प्राधिकार को चुनौती देने जैसा है।
‘कोई मजिस्ट्रेट सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी नहीं कर सकता’: मुख्य न्यायाधीश
वरिष्ठ वकील की दलीलों पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने यह नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की? हमने अपने आदेश में साफ तौर पर कहा था कि छात्रों के खिलाफ किसी तरह की जबरन कार्रवाई नहीं होगी। कोई भी मजिस्ट्रेट हमारे निर्देशों का उल्लंघन नहीं कर सकता।
मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील को निर्देश दिया कि वे इस नोटिस और पूरे घटनाक्रम को औपचारिक अर्जी के माध्यम से अदालत के रिकॉर्ड पर पेश करें। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि भले ही नोटिस वापस ले लिया गया हो, लेकिन संबंधित कार्यपालक मजिस्ट्रेट से इस दुस्साहस को लेकर लिखित स्पष्टीकरण मांगा जाएगा।

