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बलिया में मिड-डे मील घोटाले का खुलासा, दो साल खाना नहीं बना फिर भी 14 लाख का भुगतान

Ballia Mid Day Meal Fraud:बलिया के बांसडीह स्थित ताजपुर मुडियारी इंटर कॉलेज में मिड-डे मील योजना से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है। रिकॉर्ड से पता चला कि जूनियर हाई स्कूल के छात्रों को दो साल तक मिड-डे मील परोसा जा रहा था, जबकि असल में उस दौरान स्कूल में एक भी बार खाना नहीं बनाया गया। इस दौरान लगभग ₹14 लाख की सरकारी धनराशि जारी की गई थी। यह मामला तब सामने आया जब कुछ छात्रों ने जिला मजिस्ट्रेट से गोपनीय शिकायत की। डीएम के निर्देश पर कराई गई जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अब जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुकदमे के साथ सरकारी धन की रिकवरी की कार्रवाई की जाएगी।

बच्चों की शिकायत ने खोली कागजी मिड-डे-मील की पोल

यह मामला वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 का है। हाल ही में गांव के कुछ बच्चे जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह से मिले और शिकायत की कि स्कूल में मिड-डे मील नहीं बनाया जाता है। बच्चों ने यह भी आरोप लगाया कि मिड-डे मील के लिए पेमेंट छात्रों की असल संख्या का ध्यान रखे बिना ही किया जा रहा है। शिकायत को गंभीरता से लेते हुए, जिलाधिकारी ने बेसिक शिक्षा अधिकारी मनीष कुमार सिंह और जिला विकास अधिकारी आनंद प्रकाश को जांच की जिम्मेदारी दी। दोनों अधिकारियों ने पूरी गोपनीयता के साथ स्कूल का मौके पर जाकर निरीक्षण किया, ताकि पहले से तैयारी करने या रिकॉर्ड में हेर-फेर करने का कोई मौका न रहे। जांच में सामने आया कि विद्यालय में पिछले दो वर्षों से मिड-डे-मील बनाए जाने के प्रमाण नहीं मिले। इसके बावजूद रिकॉर्ड में बच्चों की उपस्थिति दर्ज होती रही और उसी आधार पर भोजन के लिए सरकारी धनराशि का भुगतान किया जाता रहा।

रसोईघर में चूल्हा-अनाज नहीं, मिला पहसुल 

जब जांच टीम स्कूल की रसोई में पहुंची, तो वहां के हालात ने भी कई सवाल खड़े कर दिए। मिड-डे मील बनाने के लिए ज़रूरी अनाज, चूल्हा और दूसरी चीजें मिलने के बजाय, रसोई में सिर्फ सब्जी काटने का एक औजार मिला। दूसरे शब्दों में, भले ही रिकॉर्ड में यह दिखाया गया था कि बच्चों के लिए रोजाना खाना बनता था, लेकिन पिछले दो सालों में नियमित रूप से खाना बनने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। जब जांच करने वाले अधिकारियों ने स्कूल के रिकॉर्ड का जमीनी हालात से मिलान किया, तो कागजी कार्रवाई और असलियत के बीच बड़ा फर्क सामने आया।

कागजों में 200 से 250 बच्चे, हकीकत पर उठे सवाल

जांच में यह भी पता चला कि कुछ बच्चों का स्कूल में रजिस्ट्रेशन सिर्फ कागज़ों पर ही था। वे असल में रेगुलर क्लास में नहीं आते थे। इसके बावजूद, मिड-डे मील के रिकॉर्ड में रोजाना लगभग 200 से 250 बच्चों की हाजिरी दिखाई जाती थी। मिड-डे मील के लिए पेमेंट इन्हीं आंकड़ों के आधार पर किया जाता था। पता चला है कि दो फाइनेंशियल ईयर के दौरान सरकारी फंड से लगभग ₹14 लाख इसी तरह खर्च किए गए।

प्रधानाचार्य और जिला समन्वयक की भूमिका सामने आई

खबरों के मुताबिक, इस मामले की जांच में स्कूल प्रिंसिपल और मिड-डे मील (MDM) स्कीम के डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर की भूमिका सामने आई है। BSA मनीष सिंह के अनुसार, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के निर्देशों के मुताबिक आगे की कार्रवाई की जाएगी। दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ केस दर्ज करने के साथ-साथ, गलत तरीके से इस्तेमाल किए गए सरकारी फंड की वसूली के लिए भी कदम उठाए जाएंगे। इस प्रक्रिया से यह भी साफ हो जाएगा कि किस स्तर पर छात्रों के एनरोलमेंट के आंकड़े, अटेंडेंस रिकॉर्ड और मिड-डे मील के पेमेंट का वेरिफिकेशन किया गया था।

गोपनीय जांच से सामने आया पूरा खेल

इस मामले का एक अहम पहलू यह था कि शिकायत के बाद जांच को गोपनीय रखा गया। अधिकारियों ने हालात का जायजा लेने के लिए स्कूल का अचानक दौरा किया, जिसमें दस्तावेजों में दर्ज दावों और असल हकीकत के बीच अंतर का पता चला। इसके बाद प्रशासन की कार्रवाई न केवल लगभग ₹14 लाख की वसूली पर केंद्रित होगी, बल्कि इस बात का पता लगाने पर भी होगी कि दो साल तक मिड-डे मील के रिकॉर्ड कैसे रखे गए और भुगतान प्रक्रिया के दौरान किस स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत हुई। (एजेंसी)

 

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