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दुनिया को बचाने के लिए आगे आया अफ्रीका, बनने जा रही 8000 KM लंबी ‘Great Green Wall’, चीन और भारत भी नक्शेकदम पर!

गांधी, लेनिन और लिंकन जैसे महान विचारकों ने समय-समय पर दुनिया को नई दिशा दी है। आज एक बार फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है, लेकिन इस बार दिशा दिखाने वाला कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे पिछड़ा माना जाने वाला ‘अफ्रीका महाद्वीप’ है। जहाँ पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग पर सिर्फ बैठकों और चर्चाओं में उलझी रही, वहीं अफ्रीकी देशों ने चुपचाप जमीन पर काम करके बाजी मार ली है। चीन की प्रसिद्ध ‘ग्रेट वॉल’ की तर्ज पर अब अफ्रीका में ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ (महा-हरित दीवार) का निर्माण किया जा रहा है।

क्या है यह ‘Great Green Wall’?

अफ्रीकी संघ (African Union) द्वारा साल 2007 में शुरू की गई यह परियोजना पर्यावरण के इतिहास में अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी और विशाल पहलों में से एक है। यह हरी दीवार सेनेगल के अटलांटिक तट से शुरू होकर लाल सागर पर स्थित जिबूती के तट तक फैलेगी। सहारा रेगिस्तान से सटे ‘साहेल’ के अर्ध-शुष्क इलाके में इसकी कुल लंबाई लगभग 8,000 किलोमीटर होगी।

शुरुआती योजना में केवल 15 किलोमीटर चौड़ी पेड़ों की एक सीधी पट्टी बनाने का विचार था। लेकिन वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की सलाह पर अब इसमें बदलाव किया गया है। अब यह केवल पेड़ों की कोई एक कतार नहीं है, बल्कि स्थानीय इकोसिस्टम के हिसाब से जंगलों, घास के मैदानों, दलदली भूमि (वेटलैंड्स) और कृषि भूमि को फिर से जीवित करने का एक विशाल नेटवर्क है।

30 मिलियन हेक्टेयर जमीन हुई सेहतमंद

इस ऐतिहासिक मुहिम में 20 से ज्यादा अफ्रीकी देश, अंतरराष्ट्रीय संगठन, विकास बैंक और वैश्विक पर्यावरण समूह एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। हालिया अनुमानों के अनुसार, इस परियोजना के तहत लगभग 30 मिलियन हेक्टेयर (3 करोड़ हेक्टेयर) खराब हो चुकी जमीन को पहले ही बहाल (उपजाऊ) किया जा चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि साल 2030 के वैश्विक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अभी और फंडिंग, मजबूत क्षेत्रीय सहयोग तथा संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा की जरूरत होगी। इसकी सफलता सिर्फ कागजी आंकड़ों या पेड़ों की संख्या से नहीं, बल्कि सुधरती मिट्टी, वन्यजीवों की वापसी और स्थानीय लोगों की आजीविका की सुरक्षा से मापी जा रही है।

सिर्फ पेड़ लगाना नहीं, मकसद है जिंदगी बचाना

साहेल क्षेत्र पिछले कई दशकों से भीषण सूखे, मरुस्थलीकरण (रेगिस्तान बनना) और गरीबी की मार झेल रहा है। यहाँ के करोड़ों लोग खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं, लेकिन उपजाऊ जमीन खत्म होने से भुखमरी और पलायन की नौबत आ गई थी। ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ इस स्थिति को जड़ से बदल रही है। इसका मुख्य उद्देश्य:

  • खराब हो चुकी मिट्टी को उपजाऊ बनाना।
  • जल संचयन (पानी रोकने की क्षमता) को बढ़ाना।
  • खाद्य सुरक्षा मजबूत कर लाखों नई नौकरियां पैदा करना।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले मजबूरन पलायन को रोकना।

भारत और चीन भी चले इसी राह पर

अफ्रीका की इस अद्भुत सफलता को देखते हुए अब भारत और चीन भी अपने यहाँ ऐसी ग्रीन वॉल तैयार कर रहे हैं। भारत सरकार गुजरात के पोरबंदर से लेकर दिल्ली-हरियाणा सीमा (पानीपत) तक एक विशाल ‘ग्रीन वॉल ऑफ इंडिया’ बना रही है। यह ग्रीन वॉल राजस्थान और हरियाणा से होकर गुजरेगी, जिसकी कुल लंबाई 1,400 किलोमीटर और चौड़ाई 5 किलोमीटर होगी। इसका उद्देश्य अरावली पहाड़ियों के रास्ते थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकना और उत्तर भारत को धूल भरे तूफानों व प्रदूषण से बचाना है।

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