छत्तीसगढ़ में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र पर विवाद, आदिवासी समाज और कांग्रेस ने उठाए सवाल
स्कूलों में तीन चरणों में प्रार्थना व्यवस्था लागू करने के सरकारी आदेश के बाद आदिवासी संगठनों, कांग्रेस और अल्पसंख्यक समूहों ने इसे संविधान और सांस्कृतिक विविधता के खिलाफ बताते हुए विरोध तेज कर दिया है।
रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 12 जून 2026 को जारी आदेश के बाद राज्य में नया विवाद खड़ा हो गया है। नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 से सभी सरकारी और निजी स्कूलों में दिन में तीन बार प्रार्थना की व्यवस्था अनिवार्य की गई है।
इसके तहत सुबह राष्ट्रगान, वंदे मातरम, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र और महापुरुषों की जीवनियों का वाचन, मध्याह्न भोजन से पहले भोजन मंत्र तथा छुट्टी के समय राज्यगीत, गायत्री मंत्र और शांति मंत्र के सामूहिक पाठ का प्रावधान किया गया है। आदेश 16 जून से लागू हो चुका है।
सरकार का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों में राष्ट्रप्रेम, अनुशासन, नैतिक मूल्यों और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने इसे मूल्य आधारित शिक्षा और बच्चों के बौद्धिक विकास से जोड़ते हुए उचित बताया है।
इस आदेश के खिलाफ बस्तर संभाग के सर्व आदिवासी समाज ने विरोध दर्ज कराया है। जगदलपुर में प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, स्कूल शिक्षा मंत्री और संस्कृति मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपते हुए आदेश वापस लेने की मांग की।
संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है तथा किसी एक धर्म विशेष की प्रार्थनाओं को अनिवार्य करना संविधान की भावना के विपरीत है।
बस्तरिया राज मोर्चा के नेता और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने भी आदेश का विरोध करते हुए कहा कि आदिवासी समुदाय की अपनी अलग परंपराएं हैं और उन पर किसी विशेष धार्मिक व्यवस्था को थोपना उचित नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि आदेश वापस नहीं लिया गया तो व्यापक आंदोलन किया जाएगा।
विरोध करने वाले संगठनों ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 25, 28, 29 और 46 के साथ पांचवीं अनुसूची तथा संयुक्त राष्ट्र के यूएनडीआरआईपी-2007 का हवाला देते हुए आदिवासी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के संरक्षण की मांग की है।
कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है। पार्टी के मीडिया विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत पर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन धार्मिक मंत्रों को अनिवार्य बनाना उचित नहीं है। पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने भी धार्मिक गतिविधियों को स्वैच्छिक रखने की वकालत करते हुए आदेश पर पुनर्विचार की मांग की।
एपीसीआर, विभिन्न ईसाई संगठनों और अल्पसंख्यक समूहों ने भी इस आदेश का विरोध करते हुए इसे शिक्षा के भगवाकरण का प्रयास बताया है। कांकेर सहित अन्य क्षेत्रों में भी ज्ञापन सौंपकर विरोध दर्ज कराया गया है।
यह विवाद राज्य में सांस्कृतिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता के बीच संतुलन की बहस को सामने लेकर आया है।

