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चार महीने बाद भी खुले आसमान के नीचे पड़ा 40 हजार टन धान बस्तर में बारिश ने बढ़ाई मुसीबत

जगदलपुर। सरकारी रिकॉर्ड में धान खरीदी का सीजन भले समाप्त हो चुका हो, लेकिन बस्तर संभाग के सैकड़ों धान खरीदी केंद्रों में अब भी हजारों मैट्रिक टन धान खुले आसमान के नीचे पड़ा हुआ है। खरीदी प्रक्रिया खत्म होने के करीब चार महीने बाद भी धान का पूरा उठाव नहीं हो पाया है। ऐसे में मानसून की शुरुआत के साथ ही धान की सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

 

कुल खरीदी के मुकाबले 40 हजार टन धान अब भी लंबित

आंकड़ों के अनुसार बस्तर संभाग के 382 धान खरीदी केंद्रों में इस वर्ष कुल 13 लाख 74 हजार 383 मैट्रिक टन धान की खरीदी की गई थी। इसके बावजूद अब तक 40 हजार 178 मैट्रिक टन धान का उठाव नहीं हो सका है। यानी खरीदी गई उपज का एक बड़ा हिस्सा अब भी केंद्रों में परिवहन का इंतजार कर रहा है।

 

बस्तर जिले के 79 धान खरीदी केंद्रों में इस सीजन 2 लाख 81 हजार 742 मैट्रिक टन से अधिक धान की खरीदी की गई थी। हालांकि खरीदी समाप्त होने के महीनों बाद भी 7 हजार 750 मैट्रिक टन से ज्यादा धान केंद्रों में ही पड़ा हुआ है।

 

बारिश और खुले भंडारण से बढ़ा नुकसान का खतरा

संभाग के विभिन्न जिलों में किसानों से खरीदा गया धान अभी तक पूरी तरह गोदामों तक नहीं पहुंच सका है। बारिश शुरू होने के बाद कई केंद्रों से धान भीगने और खराब होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। वहीं खुले में रखे धान को चूहों और अन्य कारणों से नुकसान पहुंचने की आशंका भी बढ़ गई है। केंद्र प्रबंधकों का कहना है कि समय पर उठाव नहीं होने से उन्हें लगातार परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

 

सिर्फ बस्तर ही नहीं, दंतेवाड़ा को छोड़ अधिकांश जिलों में उठाव की समस्या

समस्या केवल बस्तर जिले तक सीमित नहीं है। दंतेवाड़ा को छोड़कर बस्तर संभाग के अधिकांश जिलों में खरीदी केंद्रों पर धान का लंबित उठाव चिंता का विषय बना हुआ है। गोदामों तक परिवहन की धीमी रफ्तार के कारण कई केंद्रों में जगह की कमी भी महसूस की जा रही है, जिससे आगामी सीजन की तैयारियों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

 

हाईकोर्ट भी बन चुका है मामले में सख्त

गौरतलब है कि धान उठाव में देरी और सूखत (Driage) के मुद्दे पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहले ही सख्त रुख अपना चुका है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकारी एजेंसियों की लापरवाही के कारण धान खराब होता है तो उसका जिम्मा सहकारी समितियों पर नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को धान की सूखत (नमी कम होने से वजन में कमी) के लिए एक स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश भी दिया है।

 

मिलर्स और प्रशासन के बीच तालमेल की कमी

जानकारी के मुताबिक, पूरे संभाग में 72 मिलर्स ने खरीदी केंद्रों से धान का उठाव करने के लिए पंजीयन करा लिया है, लेकिन वे अब तक केंद्रों से धान का उठाव क्यों नहीं कर रहे हैं, इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं बता रहे हैं। कभी इसके लिए शासन से गाइड लाइन जारी नहीं होने की बात कही जा रही है तो कभी अन्य कारण बताए जा रहे हैं।

 

खाद्य विभाग और मार्कफेड पर उठाव की जिम्मेदारी

जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के विपणन अधिकारी ने बताया कि खरीदी केंद्रों से धान का उठाव कराने की जिम्मेदारी खाद्य विभाग और मार्कफेड की है। इस बीच, किसानों की परेशानी और सरकारी खजाने को हो रहे संभावित नुकसान को देखते हुए सभी की नजर इस बात पर है कि प्रशासन और संबंधित विभाग शेष धान के उठाव को कितनी तेजी से पूरा कर पाते हैं।

 

Bastar paddy lifting delay

मानसून के बीच प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

मानसून की दस्तक के बीच यह स्थिति प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के लिए चुनौती बनती जा रही है। यदि जल्द उठाव नहीं हुआ तो बारिश से धान खराब होने का खतरा और बढ़ सकता है। इससे न केवल सरकारी खजाने को नुकसान होगा, बल्कि पूरी खरीदी व्यवस्था की साख पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।

 

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब खरीदी प्रक्रिया समाप्त हुए महीनों बीत चुके हैं और बारिश का मौसम शुरू हो गया है, तब भी करोड़ों रुपये मूल्य का धान खरीदी केंद्रों में क्यों पड़ा है? अब सभी की नजर इस बात पर है कि प्रशासन और संबंधित विभाग शेष धान के उठाव को कितनी तेजी से पूरा कर पाते हैं।

 

 

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