Thu. May 28th, 2026

उर्दू अदब के महान शायर बशीर बद्र का निधन, 91 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

बशीर बद्र का निधन

साहित्य जगत से गुरुवार को एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। उर्दू ग़ज़लों को नई ऊंचाई और आम लोगों तक लोकप्रिय बनाने वाले प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने दिन के समय अंतिम सांस ली, जिसके बाद पूरे साहित्यिक और अदबी जगत में शोक की लहर फैल गई।

लंबे समय से चल रही थी गंभीर बीमारी

सूत्रों के मुताबिक, बशीर बद्र पिछले काफी समय से डिमेंशिया जैसी बीमारी से जूझ रहे थे। इस बीमारी के कारण उनकी याददाश्त कमजोर हो गई थी और वे कई बार लोगों को पहचानने में भी असमर्थ रहते थे। बीते कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी।

अंतिम संस्कार की तैयारी

परिजनों के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार गुरुवार शाम तक किए जाने की संभावना है। हालांकि, अभी तक इसके समय और स्थान को लेकर आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई है।

उर्दू शायरी को दिलाई नई पहचान

डॉ. बशीर बद्र ने उर्दू साहित्य में अपनी एक अलग पहचान बनाई। उन्होंने 1969 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन किया था। इसके बाद 1974 में उन्होंने मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग में व्याख्याता के रूप में कार्य शुरू किया और 1990 तक शिक्षण कार्य से जुड़े रहे।

उनका रचनात्मक दौर 1970 से 1990 के बीच सबसे अधिक सक्रिय माना जाता है, जब उनकी ग़ज़लें देशभर के मुशायरों में खूब सराही गईं और उन्होंने उर्दू शायरी को आम जनमानस तक पहुंचाया।

सरल शायरी से लोगों के दिलों पर राज

बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खासियत उसकी सरलता और गहरी भावनात्मक अभिव्यक्ति थी। उनकी रचनाओं में मोहब्बत, दर्द, तन्हाई और जिंदगी के अनुभवों की झलक देखने को मिलती है, जिसने हर उम्र और वर्ग के पाठकों को उनसे जोड़ दिया।

उनके कुछ मशहूर शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं:

“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।”

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।”

साहित्य जगत में अपूरणीय क्षति

बशीर बद्र का जाना उर्दू साहित्य और शायरी की दुनिया के लिए एक बड़ी और अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों को भी साहित्य और एहसास की दुनिया से जोड़ती रहेंगी।

 

About The Author