Iran-US Talks in Qatar: ईरान-अमेरिका बातचीत में पाकिस्तान हुआ किनारे? कतर की एंट्री से बदल गया पूरा खेल, क्या अब खत्म होगा तनाव?
Iran-US Talks in Qatar: पश्चिम एशिया में महीनों से जारी भीषण तनाव और युद्ध की कगार पर खड़े हालात को शांत करने के लिए कतर की राजधानी दोहा में एक बेहद गोपनीय और ऐतिहासिक बातचीत चल रही है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही यह महा-वार्ता अब एक बड़े और निर्णायक समझौते की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। इस समझौते से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) के फिर से सामान्य होने की उम्मीद बढ़ गई है।
लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा झटका पाकिस्तान को लगा है। जिस जंग को बंद कराने का मेडल पाकिस्तान अपने सीने पर पहनना चाहता था, उस मध्यस्थता (Mediation) की रेस से वह पूरी तरह बाहर हो चुका है और उसकी जगह अब एक और रईस खाड़ी देश ‘कतर’ की मुख्य मध्यस्थ के रूप में धमाकेदार एंट्री हो गई है।
कैसे कतर बन गया मुख्य मध्यस्थ और ठगा रह गया पाकिस्तान?
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, इस हाई-प्रोफाइल वार्ता में पहले मध्यस्थता का जिम्मा पाकिस्तान और तुर्की ने मिलकर उठा रखा था। पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच पहले दौर की वार्ता अपने यहाँ इस्लामाबाद में भी करवाई थी, लेकिन उसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। इसके बाद पाकिस्तान ने दूसरे दौर की बातचीत के लिए भी भरपूर कोशिशें कीं, लेकिन स्थिति ऐसी बिगड़ी कि अमेरिका और ईरान एक मेज पर बैठने को भी तैयार नहीं हुए।
असल में, ईरान ने पाकिस्तान पर यह गंभीर आरोप लगाया कि वह निष्पक्ष होने के बजाय अमेरिका की भाषा बोल रहा है। दूसरी तरफ, अमेरिका को भी पाकिस्तान की नीयत और उसकी सुरक्षा पर गहरा संदेह था। दोनों देशों के बीच उपजे इस अविश्वास का फायदा कतर को मिला। कतर ने दोनों पक्षों को न्यूट्रल ग्राउंड पर राजी किया और अब वह अपनी बेहतरीन डिप्लोमेसी के दम पर इस डील को अंजाम देने के करीब पहुंच गया है।
तेहरान बेहद गंभीर: दोहा पहुंचे ईरान के बड़े चेहरे
ईरान इस बातचीत को कितनी गंभीरता से ले रहा है, इसका अंदाजा दोहा पहुंचे उनके प्रतिनिधिमंडल से लगाया जा सकता है। इस वार्ता में ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बघेर कालिबाफ, विदेश मंत्री अब्बास अरागची और केंद्रीय बैंक के प्रमुख अब्दोलनासेर हेम्मती खुद शामिल हुए हैं।
इस प्रस्तावित समझौते के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- 60 दिनों का सीजफायर: दोनों देशों के बीच तत्काल प्रभाव से 60 दिनों का युद्धविराम लागू करना।
- समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाना: खाड़ी में बिछाई गई खतरनाक समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाने पर सहमति।
- नो-टोल ट्रेड: होर्मुज से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों पर किसी भी तरह का शुल्क (Toll) न लगाना।
- प्रतिबंधों में ढील: अमेरिकी नौसैनिक प्रतिबंधों और नाकेबंदी में धीरे-धीरे ढील देना।
$12 अरब और यूरेनियम पर अटका है अंतिम फैसला
भले ही दोनों देश बातचीत की मेज पर आ गए हैं, लेकिन अंतिम समझौते की राह में अभी भी दो बड़े रोड़े अटके हुए हैं:
1. फ्रीज संपत्तियों (Frozen Assets) का विवाद:
ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक विदेशों में ब्लॉक (फ्रीज) की गई उसकी संपत्तियों में से शुरुआती चरण में कुछ अरब डॉलर जारी नहीं किए जाते, तब तक वह किसी भी कागजात पर दस्तखत नहीं करेगा। सूत्रों के मुताबिक, तेहरान ने बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए तत्काल कम से कम 12 अरब डॉलर के फंड तक अपनी पहुंच बहाल करने की सख्त मांग रखी है।
2. परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम भंडार:
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि अमेरिका की शर्त के अनुसार ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम (Enriched Uranium) के भंडार को या तो पूरी तरह नष्ट करेगा या फिर उसे अंतरराष्ट्रीय निगरानी में खत्म करने पर राजी हो गया है। हालांकि, ईरान ने इस अमेरिकी दावे को खारिज करते हुए कहा है कि उसने ऐसा कोई कमिटमेंट नहीं दिया है और वह इस परमाणु मुद्दे पर केवल चरणों (Phases) में बात करना चाहता है।
फिलहाल दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर किसी अंतिम समझौते की पुष्टि नहीं की है, लेकिन दोहा में चल रही इस राजनीतिक बिसात पर इस समय पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।

