बंगाल में OBC आरक्षण पर बीजेपी का बड़ा ‘खेला’, ममता का फैसला पलटा, 2010 वाला फॉर्मूला लागू
पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक बदलाव देखने को मिला है। Suvendu Adhikari के नेतृत्व वाली सरकार ने नया नोटिफिकेशन जारी करते हुए राज्य में 2010 से पहले लागू ओबीसी सूची को फिर से प्रभावी कर दिया है। इस फैसले के बाद कई ऐसी जातियां, जिन्हें बाद में सूची में जोड़ा गया था, अब आरक्षण व्यवस्था से बाहर हो गई हैं।
सरकार के अनुसार अब केवल वही पुरानी और मान्य श्रेणियां लागू रहेंगी, जिनकी वैधता पहले से स्थापित थी। इस बदलाव के बाद राज्य में कुल 66 जातियों/समुदायों को ही ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलेगा और इन्हें 7 प्रतिशत कोटे के तहत नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानों में लाभ दिया जाएगा।
2010 वाला पुराना फॉर्मूला फिर लागू
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, 2010 से पहले पश्चिम बंगाल में ओबीसी सूची सीमित और चयनित श्रेणियों पर आधारित थी। उस समय किसी भी समुदाय को शामिल करने के लिए सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के मजबूत आंकड़े, ऐतिहासिक आधार और प्रशासनिक जांच अनिवार्य थी। अब सरकार ने इसी पुरानी प्रणाली को दोबारा लागू करने का निर्णय लिया है।
नई सूची से कई नाम बाहर
नए आदेश के बाद 2010 के बाद जोड़े गए कई समुदायों को ओबीसी सूची से हटा दिया गया है। सरकार का कहना है कि इन नई एंट्रीज़ को लेकर कानूनी आपत्तियां और न्यायिक सवाल उठ चुके थे, इसलिए सूची को संशोधित करना जरूरी था।
मुस्लिम समुदायों पर असर
इस फैसले का असर उन कई मुस्लिम उप-जातियों पर भी पड़ा है, जिन्हें 2010 के बाद ओबीसी सूची में शामिल किया गया था। अब उन्हें नई 66 श्रेणियों वाली सूची में शामिल नहीं किया गया है। हालांकि सरकार का दावा है कि यह निर्णय किसी धार्मिक आधार पर नहीं, बल्कि पूरी तरह कानूनी और प्रक्रिया आधारित समीक्षा के बाद लिया गया है।
राजनीतिक बयानबाज़ी तेज
सरकार का कहना है कि ओबीसी सूची में गड़बड़ियों को सुधारते हुए पुराने और मजबूत कानूनी ढांचे को फिर से लागू किया गया है। वहीं, Mamata Banerjee की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इससे कई समुदायों के आरक्षण अधिकार प्रभावित हो सकते हैं और सामाजिक संतुलन पर असर पड़ सकता है।

