Telangana Caste Survey: तेलंगाना में 12 लाख लोगों की कोई जाति नहीं लेकिन बनवा रखे हैं सर्टिफिकेट
तेलंगाना के SEEEPC 2024 सर्वे के नतीजों के मुताबिक, राज्य के 12 लाख लोगों ने खुद को ‘बिना जाति’ का बताया है. ये संख्या राज्य की आबादी का 3.4% है. इन लोगों ने भले ही अपनी जाति नहीं स्वीकार की है लेकिन इनमें से लगभग आधे लोग ऐसे हैं, जिन्होंने जाति प्रमाणित सर्टिफिकेट्स बनवाया है.
तेलंगाना ने साल 2024 में सामाजिक-आर्थिक, शैक्षिक, रोजगार, राजनीतिक और जाति (SEEEPC) सर्वे कराया था. इसके नतीजे 16 अप्रैल को जारी किए गए. इस सर्वे के मुताबिक, एक हैरान करने वाला आंकड़ा सामने आया है, जिसमें लगभग 12 लाख लोगों ने खुद को ‘बिना जाति’ वाला बताया है. खुद को बिना जाति का बताने वाले लोगों की संख्या कुछ 2-4 सौ की नहीं है बल्कि लाखों में है. इस लिहाज से इसे राज्य का 10वां सबसे बड़ा समुदाय माना जा सकता है. यानी राज्य की कुल आबादी का 3.4% हिस्सा है जो खुद की पहचान किसी जाति से जुड़े होकर नहीं मानती है, बल्कि वो इससे खुद को मुक्त मानती है. सर्वे से पता चला है कि ये समूह 11,96,482 लोगों का है.
जाति से जुड़े डॉक्यूमेंट्स का करते हैं इस्तेमाल
खुद को जाति मुक्त मानने वाले इन लोगों में लगभग आधे लोगों के पास जाति से जुड़े डॉक्यूमेंट्स हैं. वे इस डॉक्यूमेंट्स का इस्तेमाल खुद के लिए कल्याणकारी योजनाओं, नौकरियों और एजुकेशन के लिए करते हैं. ये लोग किसी गांव में नहीं बल्कि मुख्यतौर पर शहरी इलाकों के रहने वाले हैं और ये ग्रेटर हैदराबाद के आसपास बसे हुए हैं. इन लोगों को’समग्र पिछड़ापन सूचकांक’ (CBI) के आधार पर सबसे कम पिछड़े समूहों में शामिल किया गया है.
ऐसे लोग किन जातियों की श्रेणी में?
आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि जाति-पहचान को नहीं मानने का चलन उन लोगों में बहुत आम है. इनके पास पहले से ही अच्छी शिक्षा, वेतन वाली नौकरी और बेहतर आमदनी है. ऐसे लोग उन सामाजिक और आर्थिक परिणामों से भी काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं, जिनका सामना जाति-व्यवस्था के कारण आज भी दूसरे लोगों को करना पड़ता है.
यह सर्वे ‘कोई जाति नहीं’ (No Caste) को महज एक खाली जवाब के तौर पर नहीं, बल्कि एक अलग सामाजिक घटना को जाहिर करता है. प्रशासनिक तौर पर इस समूह को ‘अन्य जातियां’ (OC) श्रेणी में रखा गया है. फिर भी उनकी ये पहचान वास्तिवक तौर पर उनके विरोधाभास भी दिखाता है. जिन लोगों ने ‘कोई जाति नहीं’ का विकल्प चुना, उनमें से 43.3% लोगों के पास अब भी जाति प्रमाण पत्र मौजूद हैं. भले ही कुछ उत्तरदाता जाति को अपनी पहचान के तौर पर स्वीकार करने से इनकार करते दिखते हैं, लेकिन संस्थाओं में कामकाज निपटाने या पैतृक फायदों को पाने के लिए वे जाति से जुड़े डॉक्यूमेंट्स को अपने पास बनाए रखते हैं.

