एक चश्मे से देखें, मणिपुर-बस्तर ..!
तुलनात्मक अध्ययन नहीं हकीकत को समझे- स्वीकारें बस्तर नक्सली हिंसा
रायपुर। तीन माह से मणिपुर जल रहा है- जिसकी आग की ताप देश भर में फैली हुई है। हर राजनैतिक दल अपने-अपने हिसाब से घटनाक्रमों की निंदा कर- शर्मनाक करार दे रहा हैं बहस जारी है- होनी भी चाहिए। पर क्या मुद्दा विशेष को सियासत का अमलीजामा पहनाने की जगह निराकरण के लिए वहां संयुक्त राजनैतिक प्रयास नहीं किए जाने चाहिए। दूसरी ओर बस्तर की नक्सल समस्या जहां ढाई-तीन दशक हो गए- समस्या का निपटारा नहीं हुआ। हजारों निर्दोष मारे जा चुके, सैकड़ो, शहीद हुए हैं। पर सभी राजनैतिक दल कभी एकजुट होकर वहां समस्या निराकरण करने का प्रयास करते नहीं दिखे।
मणिपुर के खराब हालत की कुछ-कुछ जानकारी छनकर बाहर आ रही है। वहां समस्या बस्तर समस्या से अलग है। मणिपुर में 2 वर्ग आपस में जानी दुश्मन का व्यवहार करने लगे हैं। तो बस्तर में घुसे पड़े नक्सली भोले-भाले आदिवासियों का मुंह सील कर रखे हुए हैं। मुखबिरी के आरोप में सैकड़ों ग्रामीणों को चौपाल लगाकर सरेआम भून डालते हैं। या काट फेकते हैं। परिजनों की मौजूदगी में विकास के रास्ते- शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी, बिजली, बाजार का विरोध करते हैं। कभी शेष भारत ने सोचा है कि (राजनैतिक दलों) बेचारे बस्तर वासियों, ग्रामीणों – वनांचलों में रहने वालो पर क्या बीतती होगी। कभी महसूस किया है दहशत में जीना नरक से गया गुजरा लगता है।
मणिपुर मामले में समुदाय विशेषों के झगड़े में शायद उग्रवादी या बाहरी लोग, अंदर पहुंच गए हैं। हजारों- हथियार, लाखों गोलियां, बारूद थानों,शिविरों से लुटे बैठे- दोनों समुदाय के लोग बंकर बना एक-दूसरे पर गोलाबारी कर रहे हैं। सेना के जवानों को जांच-पड़ताल हेतु अंदर घुसने नहीं दे रहे हैं। सेना अपने नागरिकों पर गोली चला नहीं सकती। शायद उग्रवादी वहां के ग्रामीणों की आड़ लिए हुए हो। कुछ इसी तरह बस्तर के बीहड़ जंगलों में नक्सली छिपे बैठे हैं। ग्रामीणों के मध्य पहचान मुश्किल है कि कौन ग्रामीण कौन नक्सली है। यहां भी पुलिस-सेना (सशस्त्र बल) के जवान जंगल के अंदर घुस नहीं पा रहे हैं। नक्सली घात लगा दर्जन-दर्जन भर जवानों, नेताओं को मारते रहे हैं।
देश का अभिन्न हिस्सा मणिपुर-बस्तर दोनों है। जिनमें शांति, भाईचारा, उग्र-नक्सल मुक्त विकास को गति देने, मूलभूत जरूरतों देश की मूलधारा से भटके लोगों को वापस जोड़ने संयुक्त प्रयास तमाम राजनैतिक दलों को करना चाहिए। सियासत अपनी जगह है देशभर के प्रत्येक हिस्सों में शांति प्रयास अमन-चैन कायम करना रखना राजनैतिक दलों का भी दायित्व है। राजनीति के लिए मौके आते-जाते रहते हैं। फिलहाल मणिपुर बस्तर दोनों को बचाने की जरूरत हैं।
बस्तर के नक्सल हमला से अब तक शहीद होने सैकड़ों जवानों में शायद ही कोई राज्य बचा होगा जहां का कोई एक जवान (बस्तर नक्सली मुठभेड़) शहीद न हुआ हैं। आजादी मिलकर प्रयास करने से हासिल हुई थी। पर्व नजदीक है मणिपुर-बस्तर हेतु सबको मिलकर प्रयास करना होगा जरूरत दलगत भावना से ऊपर उठने की है। रही जनता के बात ए पब्लिक है सब जानती—! बस्तर के अंदर माताओं, बहनों, बच्चों, युवाओं से नक्सली कैसे पेश आते हैं। उनकी क्या-क्या हरकतें हैं आदि जानकारी बेहद कम बाहर आ पाती है। एक परिक्षेत्र बाद वहां घुसना प्रतिबंधित है यह सब वहां आज नहीं तीन दशक से बना हुआ है।

