Jhiram Ghati Naxal Attack 13 Anniversary: क्या शहीद परिवारों को मिला न्याय या सिर्फ ‘तेरहवीं’ मनाकर रह गई सियासत
Jhiram Ghati Naxal Attack 13 Anniversary: छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में स्थित झीरम घाटी का नाम आज भी जेहन में आते ही एक खामोश सिहरन पैदा कर देता है। 25 मई 2013 को हुआ वह खौफनाक मंजर आज भी छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक अमिट जख्म की तरह दर्ज है। इस कांप कपा देने वाले नरसंहार को आज पूरे 13 साल बीत चुके हैं। 13वीं बरसी पर आज पूरा प्रदेश शहीदों को नमन कर रहा है, लेकिन इसके साथ ही एक टीस भरा सवाल फिर हवा में तैर रहा है—क्या झीरम के पीड़ितों को न्याय मिला, या फिर हर साल सिर्फ बरसी मनाकर इंसाफ की आस को छोड़ दिया गया है?
25 मई 2013: जब लोकतंत्र पर हुआ था सबसे बड़ा हमला
साल 2013 में कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ के दौरान नेताओं का काफिला बस्तर से गुजर रहा था। तभी झीरम घाटी के घने जंगलों में घात लगाकर बैठे सैकड़ों नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। यह हमला महज़ एक नक्सली वारदात नहीं थी, बल्कि चुन-चुनकर और नाम पूछ-पूछकर की गई नेताओं की क्रूर हत्या थी। इस नरसंहार में तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और ‘बस्तर टाइगर’ के नाम से मशहूर महेंद्र कर्मा समेत 32 से अधिक नेताओं, कार्यकर्ताओं और वीर जवानों ने अपनी जान गंवाई थी। यह हमला उस दौर में ‘रेड कॉरिडोर’ के केंद्र बस्तर पर नक्सलियों की ताकत का खुला प्रदर्शन था।
जांच की भूलभुलैया: एनआईए से लेकर न्यायिक आयोग तक सब नाकाम!
तेरह साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी इस हमले की पीछे की असली राजनीतिक साजिश का पर्दाफाश नहीं हो सका है। इस मामले की जांच एनआईए (NIA), सीबीआई (CBI), एसआईटी (SIT) और कई न्यायिक आयोगों के हाथों से गुजरी, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। हालांकि, बस्तर के आईजी सुंदरराज पी का कहना है कि इस हमले के लिए जिम्मेदार दरभा डिवीजन कमेटी को सुरक्षाबलों ने पूरी तरह खत्म कर दिया है—कई नक्सली मारे गए, कुछ गिरफ्तार हुए और कइयों ने सरेंडर कर दिया। लेकिन हिड़मा, देवा और बसवराजू जैसे मास्टरमाइंड्स के नाम आने के बावजूद, जवाबदेही की पूरी श्रृंखला और असली आकाओं का चेहरा आज तक बेनकाब नहीं हो पाया है।
खूनी वारदात का सबसे सजीव सबूत: आज भी जंगल में मौजूद
झीरम घाटी में आज सड़क के एक किनारे शहीदों की याद में एक स्मारक खड़ा है, जहां नेता आकर फूल चढ़ाते हैं। लेकिन इस सरकारी दावे से कुछ ही दूरी पर, घने जंगल के भीतर उस खौफनाक दिन का एक और गवाह मौजूद है। हमले का शिकार हुई एक लाल बोलेरो गाड़ी का जंग खाया हुआ दरवाजा आज भी वहीं लावारिस पड़ा है। यह कोई आधिकारिक स्मारक नहीं है, बल्कि उस दिन की भयानक हिंसा और वक्त की मार का सबसे सजीव और कड़वा सबूत है।
13वीं बरसी पर फिर शुरू हुआ ‘इंसाफ का सियासी खूनी खेल’
झीरम कांड की इस बरसी पर छत्तीसगढ़ की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। कांग्रेस और भाजपा के नेता आमने-सामने हैं और एक-दूसरे पर सबूत छुपाने और राजनीति करने के संगीन आरोप लगा रहे हैं।
“भूपेश बघेल जेब से सबूत निकालें तो खुलेगी परतें” – अजय चंद्राकर
भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, “जिस दिन भूपेश बघेल अपने जेब में रखे सबूत को सार्वजनिक करेंगे और कवासी लखमा को सामने रखकर प्रदेश की जनता को उस दिन का पूरा घटनाक्रम बताएंगे, उस दिन परतें खुद-ब-खुद खुल जाएंगी। कांग्रेस ने इस मामले को सिर्फ अपनी राजनीतिक ऑक्सीजन और सहानुभूति बटोरने का जरिया बना रखा है, जबकि भाजपा ने हर स्तर पर निष्पक्ष कार्रवाई की है।”
“भाजपा ने जांच होने नहीं दी, जंग जारी रहेगी” -भूपेश बघेल
वहीं, पलटवार करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया पर शहीदों को नमन करते हुए लिखा, “झीरम का हमला लोकतंत्र की आवाज को दबाने का एक क्रूर और सुनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र था। 13 साल बीत गए, जख्म आज भी ताजा हैं और न्याय अधूरा है। लेकिन हमारे हौसले टूटे नहीं हैं, न्याय की यह लड़ाई थमी नहीं है। भाजपा ने झीरम हत्याकांड की जांच न तो खुद की और न ही हमें करने दी। इस खूनी खेल के पीछे छिपे असली सूत्रधारों का सच एक दिन दुनिया के सामने जरूर आएगा।”
शहीदों के परिवार आज भी बस्तर के इस शांत पड़े जंगलों से एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर उन्हें अपनी वफादारी और शहादत की कीमत पर मुकम्मल इंसाफ कब मिलेगा?

