झारखंड के पारंपरिक वाद्य को मिला GI टैग,मांदर की गूंज पहुंची दुनिया तक
रांचीः झारखंड के ‘मंदार’ को—जो राज्य की पहचान, लोक-संस्कृति और पारंपरिक जीवन-शैली से गहराई से जुड़ा है—भारत सरकार के तहत चेन्नई स्थित ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री’ ने ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशन’ (GI) का दर्जा प्रदान किया गया है। झारखंड के पारंपरिक लोक वाद्ययंत्र के तौर पर मांदर की एक अलग पहचान है और यह राज्य की लोक परंपराओं, नृत्य शैलियों और सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा रहा है। ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग के लिए जमा की गई अर्जी में मांदर की अनोखी बनावट, स्थानीय कच्चे माल के इस्तेमाल, इसे बनाने की प्रक्रिया, इसकी आवाज की खासियत और झारखंड के साथ इसके गहरे सांस्कृतिक संबंध को विस्तार से प्रमाणित किया गया था।
जीआई टैग दिलाने में सत्यदीप सिंह ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
डॉ. सत्यदीप सिंह ने झारखंड के मंदार के लिए GI (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग हासिल करने की पूरी प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने आवेदन दाखिल करने और चेन्नई में जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री के सामने मामले की पैरवी करने से लेकर जरूरी दस्तावेज जमा करने और सभी जरूरतों को पूरा करने तक, हर काम संभाला। उन्होंने अलग-अलग चरणों में इस आवेदन को आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई। डॉ. सिंह ने जनवरी 2025 में दिल्ली में हुई अंतिम सुनवाई के दौरान मामले को प्रभावी ढंग से पेश किया।
जीआई टैग के लिए ऐतिहासिक और प्रामाणिक दस्तावेज पेश किया
इस मामले की एक खास बात यह थी कि झारखंड के साथ मंदार के लंबे समय से चले आ रहे और अनोखे सांस्कृतिक जुड़ाव को साबित करने के लिए आवेदन के साथ कई ऐतिहासिक और प्रामाणिक दस्तावेज जमा किए गए थे। मुख्य सबूतों में मशहूर मानवविज्ञानी शरत चंद्र रॉय की 1915 की रचना, तारक चंद्र दास की 1931 की रचना और जाने-माने मानवविज्ञानी डब्ल्यू.जी. आर्चर की 1940 की किताब द ब्लू ग्रोव में मंदार मांदर के उल्लेख को प्रमुख साक्ष्य के रूप में शामिल किया गया। इनके अतिरिक्त वर्ष 1920 की पटना संग्रहालय की वार्षिक रिपोर्ट, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की 1956 की ‘फोक डांसिज इन इंडिया’ और बिहार जिला गजेटियर, रांची जैसे अभिलेख भी प्रस्तुत किए गए। इन दस्तावेजों में मांदर को झारखंड के तत्कालीन आदिवासी समुदायों के संगीत, नृत्य और सामाजिक जीवन से जुड़ा हुआ दर्शाया गया है। छोटानागपुर इलाके में रहने के दौरान स्थानीय उरांव समुदाय की परंपराओं और लोक-जीवन का अध्ययन करने वाले W.G. आर्चर के रिकॉर्ड्स बहुत अहम रहे हैं। 1940 में छपी उनकी किताब में मंदर को स्थानीय पारंपरिक नृत्य और संगीत से जुड़े वाद्ययंत्र के तौर पर बताया गया है। इस एप्लीकेशन में उनके इकट्ठा किए गए स्थानीय लोक-काव्य का भी जिक्र है, जो मंदर के साथ समुदाय के गहरे भावनात्मक जुड़ाव को दिखाता है।
पहले सोहराय-खोवर, अब मांदर
डॉ. सत्यदीप सिंह झारखंड की पारंपरिक कला और उत्पादों को ‘ज्योग्राफिकल इंडिकेशन’ (GI) टैग दिलाने के लिए लगातार कोशिशें कर रहे हैं। इससे पहले, उन्होंने झारखंड की सोहराय खोवर चित्रकला को भौगोलिक संकेतक का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जो राज्य का पहला ‘ज्योग्राफिकल इंडिकेशन’ बना था। इसके बाद इसी वर्ष कोडरमा के केसरिया कलाकंद को भौगोलिक संकेतक का दर्जा दिलाने की प्रक्रिया में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब झारखंड के मांदर को मिली यह मान्यता उनके प्रयासों की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
2021 में जीआई टैग के लिए किया गया था आवेदन
झारखंड के मांदर के लिए जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग का आवेदन 2021 में जमा किया गया था। इस आवेदन में मांदर की खास बनावट, स्थानीय लाल मिट्टी के इस्तेमाल, इसे बनाने के पारंपरिक तरीके, इसकी अनोखी आवाज और झारखंड के अलग-अलग आदिवासी समुदायों के साथ इसके जुड़ाव के बारे में विस्तार से बताया गया था। इसमें राज्य के अलग-अलग इलाकों और समुदायों में मांदर को बनाने और इस्तेमाल करने की पुरानी परंपरा पर भी जोर दिया गया था।
गुमला के डीसी की भी सक्रिय भूमिका रही
गुमला के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर करण सत्यार्थी ने मंदार के लिए ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग हासिल करने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई। गुमला ज़िला प्रशासन ने जरूरी प्रशासनिक और स्थानीय सहयोग दिया। इसके अलावा, मुख्यमंत्री के लघु और कुटीर उद्योग विकास बोर्ड और गुमला के जिला समन्वयक सूरज कुमार ने भी जरूरी मदद की। झारखंड के मांदर को मिला भौगोलिक संकेतक का दर्जा राज्य की लोकसंस्कृति, पारंपरिक ज्ञान, शिल्पकौशल और कारीगरों की विरासत के लिए ये महत्वपूर्ण पहचान है। आवेदन में भी मांदर को झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए इसकी विशिष्ट भौगोलिक संबद्धता और सांस्कृतिक उपयोग को विस्तार से स्थापित किया गया था।(एजेंसी)

