क्या यही विकसित भारत की तस्वीर है? बहन की मौत साबित करने कब्र से शव निकालकर बैंक पहुंचा भाई
✍🏻 प्रवीण शुक्ला: हम आजादी के 78 साल पूरे कर चुके हैं। देश ने अमृतकाल का उत्सव मनाया, चांद पर कदम रखा, डिजिटल इंडिया का सपना साकार किया और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत की। हम खुद को विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और तेजी से विकसित होती सभ्यता बताते हैं। लेकिन क्या विकास केवल बड़ी-बड़ी योजनाओं, हाईवे, मेट्रो और डिजिटल आंकड़ों तक सीमित है?
यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि हाल ही में ओडिशा से सामने आई एक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की मजबूरी नहीं, बल्कि हमारी प्रशासनिक संवेदनहीनता, जटिल व्यवस्था और मानवीय मूल्यों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है।
आखिर ऐसा कौन सा सिस्टम है, जिसने एक भाई को यह करने पर मजबूर कर दिया?
कल्पना कीजिए…
एक भाई, जिसने कुछ दिन पहले अपनी बहन को खोया हो। दुख से उबर भी न पाया हो और अचानक उसे यह साबित करने के लिए कहा जाए कि उसकी बहन सच में मर चुकी है।
और फिर…
वह मजबूरी में कब्र खोदता है, बहन के शव को बाहर निकालता है, उसे कंधे पर उठाकर कई किलोमीटर दूर बैंक तक लेकर जाता है, सिर्फ इसलिए ताकि बैंक को “सबूत” दिखाया जा सके।
क्या यह दृश्य किसी फिल्म का हिस्सा है?
क्या यह किसी पिछड़े या युद्धग्रस्त देश की कहानी है?
नहीं… यह उस भारत की घटना है, जो खुद को विकसित राष्ट्र बनाने की दौड़ में सबसे आगे बताता है।
क्या इंसानियत से बड़ा कोई नियम हो सकता है?
कानून और प्रक्रियाएं व्यवस्था चलाने के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन जब वही नियम इंसानियत को कुचलने लगें, तब सवाल उठना लाजिमी है।
अगर किसी बैंक कर्मचारी ने वास्तव में मृतक का शव दिखाने जैसी अमानवीय मांग की, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। आखिर कौन सा नियम किसी गरीब और मजबूर इंसान को इस हद तक अपमानित करने की अनुमति देता है?
अगर ऐसा कोई नियम है, तो उसे तुरंत खत्म किया जाना चाहिए। और यदि ऐसा कोई नियम नहीं है, तो फिर उस कर्मचारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए जिसने एक शोकग्रस्त परिवार को इस दर्दनाक स्थिति में पहुंचा दिया?
विकास का असली पैमाना क्या है?
हम अक्सर कहते हैं कि देश बदल रहा है।
लेकिन क्या केवल इमारतें, एक्सप्रेसवे और डिजिटल सेवाएं ही विकास का पैमाना हैं?
असल विकास तो तब होगा जब:
किसी गरीब को अपनी बात साबित करने के लिए अपमानित न होना पड़े,
सरकारी और बैंकिंग व्यवस्था संवेदनशील बने,
इंसान की गरिमा कागजों और प्रक्रियाओं से ऊपर रखी जाए।
आज भी देश के कई हिस्सों में लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहीं सड़क नहीं, कहीं अस्पताल नहीं, कहीं पीने का पानी नहीं। लेकिन इन सबके बीच भी इंसानियत बची रहनी चाहिए। यदि व्यवस्था इंसान को उसकी मृत बहन का शव कंधे पर उठाकर बैंक ले जाने को मजबूर कर दे, तो हमें रुककर खुद से पूछना होगा कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं।
क्या ऐसी घटनाएं सिर्फ खबर बनकर रह जाएंगी?
हर बार ऐसी घटना सामने आती है, कुछ दिन चर्चा होती है, सोशल मीडिया पर गुस्सा दिखाई देता है और फिर सब सामान्य हो जाता है। लेकिन क्या कभी सिस्टम बदलता है?
नीति निर्धारकों और प्रशासन को यह समझना होगा कि हर नियम का केंद्र “मानव” होना चाहिए, न कि केवल दस्तावेज और प्रक्रिया। ऐसी व्यवस्थाएं बनाई जानी चाहिए, जहां किसी परिवार को अपने मृत परिजन की गरिमा के साथ समझौता न करना पड़े।
यह घटना सिर्फ ओडिशा की नहीं, पूरे समाज के लिए सवाल है
यह मामला केवल एक राज्य या एक बैंक तक सीमित नहीं है। यह उस सोच पर सवाल है, जहां व्यवस्था इंसान से ज्यादा कागजों को महत्व देने लगती है।
एक सभ्य समाज की पहचान उसकी तकनीक या आर्थिक ताकत से नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता से होती है। और जब कोई भाई अपनी बहन की लाश कंधे पर लेकर बैंक पहुंचने को मजबूर हो जाए, तो यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है।
✍🏻– प्रवीण शुक्ला

