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युद्धविराम के बाद भी नहीं लौटेगा पुराना होर्मुज, ईरान बोला- जहाजों से वसूला जाएगा शुल्क

अमेरिका-ईरान समझौते के बीच ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघर गालिबफ के बयान से बढ़ी चिंता, वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर फिर मंडराया संकट।

 

अमेरिका और ईरान के बीच हालिया युद्धविराम के बाद दुनिया को होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा सामान्य रूप से खुलने की उम्मीद थी। दोनों देशों के बीच हुए समझौते को वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन समझौते के लागू होने से पहले ही ईरान के ताजा बयान ने नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

 

ईरान के मुख्य वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघर गालिबफ ने सरकारी टेलीविजन को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य अब कभी युद्ध-पूर्व स्थिति में नहीं लौटेगा। उन्होंने कहा कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर ईरान का अधिकार है और यहां से गुजरने वाले जहाजों को दी जाने वाली सेवाओं के बदले शुल्क देना होगा।

 

गालिबफ का यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के विपरीत है, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह जलमार्ग स्थायी रूप से टोल-फ्री रहेगा। हालांकि दोनों देशों के बीच हुए समझौते के आधिकारिक मसौदे के अनुसार, ईरान शुरुआती 60 दिनों तक जहाजों को बिना किसी शुल्क के सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराने पर सहमत हुआ है।

 

28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई थी। युद्ध के दौरान ईरान ने कई जहाजों को निशाना बनाया, जबकि अमेरिका ने क्षेत्र में कड़ी नाकेबंदी लागू कर दी थी। इसके कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई और तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई।

 

युद्ध से पहले दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल व्यापार का आवागमन इसी समुद्री मार्ग से होता था। इसके बंद होने से भारत समेत कई आयात-निर्भर देशों में ईंधन आपूर्ति को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई थीं।

 

गालिबफ ने इस समझौते को अमेरिका की कूटनीतिक विफलता करार देते हुए कहा कि यह समझौता संयुक्त राज्य अमेरिका की हार का प्रमाण है और दुनिया आने वाले समय में इस टकराव के वास्तविक परिणाम देखेगी।

 

इस बीच अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्टों में भी होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की बढ़ती पकड़ को लेकर चिंता जताई गई है। अधिकारियों का मानना है कि ईरान ने यह साबित कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर वह वैश्विक समुद्री यातायात को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यही वजह है कि युद्धविराम और समझौते के बावजूद इस अहम समुद्री मार्ग को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

 

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