हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: छत्तीसगढ़ के पेंशनर्स को मिलेगा 59 महीने का एरियर
छत्तीसगढ़ के हजारों सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए बिलासपुर हाईकोर्ट से राहत भरी खबर आई है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने साफ कहा कि राज्यों के बीच वित्तीय दायित्वों को लेकर किसी भी तरह का विवाद पेंशनर्स के वैधानिक अधिकारों में बाधा नहीं बन सकता। इस फैसले के बाद छठवें और सातवें वेतन आयोग के तहत लंबित 59 महीने के एरियर के भुगतान का रास्ता लगभग साफ हो गया है।
कट-ऑफ डेट के कारण रुका था एरियर
मामला उस समय शुरू हुआ जब छत्तीसगढ़ पेंशनर्स समाज ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में कहा गया कि सरकार ने वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करते समय अलग-अलग कट-ऑफ तिथियां तय कर पुराने पेंशनर्स को एरियर के लाभ से वंचित कर दिया। इससे हजारों पेंशनभोगियों को 32 महीने और 27 महीने के बकाया भुगतान का लाभ नहीं मिल सका।
सरकार ने वित्तीय हिस्सेदारी का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील दी कि मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत वित्तीय दायित्व साझा होने के कारण एरियर भुगतान के लिए मध्य प्रदेश सरकार की सहमति आवश्यक है। हालांकि, पेंशनर्स की ओर से अदालत को बताया गया कि केंद्र सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि इस तरह की सहमति एरियर भुगतान के लिए अनिवार्य नहीं है।
सिंगल बेंच के आदेश को मिला समर्थन
इससे पहले हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने राज्य सरकार के आदेशों को भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक मानते हुए उन्हें निरस्त कर दिया था। अदालत ने सरकार को 120 दिनों के भीतर पात्र पेंशनर्स को पूरा एरियर जारी करने का निर्देश दिया था। साथ ही यह भी कहा गया था कि यदि आवश्यक हो तो भुगतान के बाद राज्य सरकार अपना हिस्सा मध्य प्रदेश सरकार से प्राप्त कर सकती है।
कोर्ट ने पेंशनर्स के अधिकारों को दी प्राथमिकता
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि जिन कर्मचारियों ने वर्षों तक सरकारी सेवा दी है, उन्हें प्रशासनिक या वित्तीय विवादों के कारण उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि पेंशन सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसका भुगतान समय पर होना चाहिए। इस फैसले से प्रदेश के हजारों पेंशनर्स को लंबे समय से लंबित एरियर मिलने की उम्मीद और मजबूत हो गई है।

