बीजेपी को झटका लगते ही क्यों मुखर हो जाते हैं NDA के सहयोगी? चिराग, मांझी और उपेंद्र की रणनीति समझिए
पटनाः बिहार की राजनीति में और केंद्र में NDA के भीतर चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टियां इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर हैं। एनडीए का हिस्सा होते हुए भी, ये तीनों नेता गठबंधन में रहते हुए अपने-अपने अलग रास्ते अपना रहे हैं, जिसका उद्देश्य अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करना और अपने मुख्य वोट बैंक को बरकरार रखना है।
युवाओं और प्रदर्शनों पर चिराग-मांझी की पार्टी का अलग रुख
दिल्ली में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के छात्र आंदोलन और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर जीतन राम मांझी की रणनीति से पता चलता है कि वह एनडीए के कट्टर समर्थक हैं। जीतन राम मांझी ने प्रदर्शनकारियों को ‘तिलचट्टे और झींगुर’ कहा और केंद्र में भाजपा सरकार को शेर बताया। वहीं दूसरी ओर, चिराग पासवान ने मांझी के इस बयान का जवाब देते हुए कहा कि अपने राजनीतिक फायदे के लिए युवाओं को कमजोर या अराजकतावादी कहना गलत है। चिराग पासवान ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है।
आगामी चुनावों में अधिक सीटों के लिए दबाव की रणनीति
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी आगामी चुनावों में अधिक सीटें हासिल करने और अपने समर्थक मतदाताओं पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने की रणनीति के तहत बयान दे रहे हैं। जीतन राम मांझी ने हाल ही में आरोप लगाया कि सीट बंटवारे के समझौते में उनकी पार्टी को सिर्फ एक “खिलौना” मिला, जबकि सरकार के खिलाफ बोलने वालों को ज्यादा तवज्जो मिली। इस बयान को चिराग पासवान पर सीधा हमला माना गया।
दूसरी ओर, चिराग पासवान NDA के भीतर अपनी पार्टी का कद बढ़ाने में सफल रहे हैं। वे सार्वजनिक मुद्दों में सक्रिय रूप से भाग लेकर बिहार में NDA के सबसे लोकप्रिय चेहरे के रूप में खुद को स्थापित करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। कई मौकों पर, एलजेपी-आर नेताओं ने सार्वजनिक रूप से चिराग पासवान को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने का प्रयास किया है।
युवा चेहरा और महादलित कार्ड की रणनीति
चिराग पासवान की रणनीति NDA सरकार में मंत्री रहते हुए अपनी स्वतंत्र पहचान, युवा छवि और दलित नेतृत्व को बरकरार रखना है। वहीं, जीतन राम मांझी की रणनीति महादलित कार्ड खेलकर और गठबंधन के शीर्ष नेतृत्व के प्रति वफादारी जताकर सीटों के बंटवारे में अपना हिस्सा बढ़ाना है।
आरक्षण के मुद्दे पर भी सियासत
सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मुद्दे पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच खुलकर टकराव हुआ है। हालांकि दोनों दलों के नेता आरक्षण बनाए रखने के पक्षधर हैं, लेकिन आरक्षण किसे मिलना चाहिए, इस बारे में उनके तर्क अलग-अलग हैं।
उपेंद्र कुशवाहा भी अपनी प्राथमिकताओं को अनुसार रखते हैं पक्ष
RLM प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा भी अपने राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर मुद्दों पर रुख अपनाते हैं। उन्होंने पहले अपनी पत्नी को विधायक चुना और फिर अपने बेटे को मंत्री बनाने में सफलता हासिल की। एनडीए का हिस्सा रहते हुए भी उपेंद्र कुशवाहा अपनी अलग पहचान बनाए रखना चाहते हैं। उन्हें अपने सामाजिक आधार, क्षेत्रीय मुद्दों और अपने समर्थकों की अपेक्षाओं का ध्यान रखना होगा। हालांकि, उनकी पार्टी के तीन अन्य विधायकों के विचार अक्सर उपेंद्र कुशवाहा से भिन्न रहे हैं। (एजेंसी)

