TET अनिवार्यता पर शिक्षकों का मौन आंदोलन: 1.5 लाख में से केवल 4 हजार फॉर्म, शासन को फिर आगे खिसकानी पड़ी डेडलाइन
भोपाल। मध्य प्रदेश में सेवारत सरकारी शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) अनिवार्य किए जाने के फैसले पर सरकार और शिक्षकों के बीच टकराव की स्थिति अब खुलकर सामने आने लगी है। शिक्षकों की बेरुखी और अंदरूनी विरोध के चलते शासन को एक बार फिर अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। आवेदन की समयसीमा समाप्त होने के अंतिम दिन प्रशासन ने तीसरी बार टीईटी फॉर्म भरने की अंतिम तारीख बढ़ाकर 11 अक्टूबर 2026 कर दी है।
1.5 लाख शिक्षकों का मौन विरोध, पोर्टल पर पसरा सन्नाटा
प्रदेश भर में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के करीब डेढ़ लाख सेवारत सरकारी शिक्षक सीधे तौर पर इस परीक्षा के दायरे में आ रहे हैं। इसके बावजूद अब तक जमा हुए कुल 22 हजार आवेदनों में से सरकारी शिक्षकों की हिस्सेदारी महज 4 हजार के करीब है। बाकी आवेदन बाहरी और नए अभ्यर्थियों के हैं। वर्षों से सेवाएं दे रहे शिक्षकों का यह ठंडा रुख साफ संकेत दे रहा है कि वे अनिवार्य परीक्षा के इस सरकारी फरमान का मौन रूप से बहिष्कार कर रहे हैं।
दबाव में आया विभाग, तीसरी बार बढ़ाई गई अंतिम तिथि
तय कार्यक्रम के मुताबिक आज आवेदन का अंतिम दिन था, लेकिन सरकारी स्कूलों से शिक्षकों के आवेदन न आने से शिक्षा विभाग और परीक्षा मंडल के हाथ-पांव फूल गए। यदि परीक्षा रद्द या स्थगित होती तो सरकार की नीतियों पर सीधा सवाल उठता। यही वजह है कि शासन ने आनन-फानन में तीसरी बार समयसीमा में विस्तार करते हुए इसे 11 अक्टूबर तक टाल दिया, ताकि शिक्षकों को मनाने और फॉर्म भरवाने का एक और अवसर मिल सके।
सेवा सुरक्षा को लेकर शिक्षकों में असंतोष की लहर
शिक्षक संगठनों का अंदरूनी तर्क है कि 10 से 15 साल से अध्यापन करा रहे नियमित शिक्षकों पर अब पात्रता परीक्षा थोपना उनके आत्मसम्मान और सेवा शर्तों के साथ अन्याय है। शिक्षकों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि परीक्षा पास न करने की स्थिति में उनकी वेतन वृद्धि और पदोन्नति पर तलवार लटक सकती है। इसी असंतोष के चलते शिक्षकों ने फॉर्म भरने से दूरी बना रखी है, जिसने अब सरकार को भारी नीतिगत संकट में डाल दिया है।

