क्या रद्द होगा दतिया विधायक का निर्वाचन? 33 साल पुराने केस को लेकर घनश्याम सिंह के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंची भाजपा
दतिया। मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजों के बाद राजनीतिक पारा एक बार फिर चढ़ गया है। कांग्रेस के टिकट पर 6 हजार 16 वोटों से शानदार जीत दर्ज करने वाले नवनिर्वाचित विधायक घनश्याम सिंह के निर्वाचन पर कानूनी सवाल खड़े हो गए हैं। नामांकन के दौरान प्रस्तुत चुनावी हलफनामे में कथित तौर पर एक पुराने आपराधिक मामले का ब्योरा न देने के आरोप को आधार बनाकर जबलपुर हाईकोर्ट में एक चुनाव याचिका दायर की गई है।
33 साल पुराने घटनाक्रम का दिया हवाला
याचिकाकर्ता भाजपा नेता व अधिवक्ता दीपक बेलपत्री ने अधिवक्ता शिवम गौतम के जरिए 17 सितंबर को यह याचिका कोर्ट में पेश की। याचिका में उल्लेख किया गया है कि वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद दतिया में व्यापक विरोध प्रदर्शन और चक्का जाम हुआ था। आरोप है कि उस दौरान दर्ज हुए एक आपराधिक प्रकरण में घनश्याम सिंह का नाम भी शामिल था, जिसकी जानकारी उन्होंने हालिया उपचुनाव के नामांकन पत्र में अनिवार्य शपथपत्र के तहत दर्ज नहीं की। याचिकाकर्ता का तर्क है कि तथ्यों को छिपाना जनप्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन है, इसलिए उनका निर्वाचन अमान्य घोषित किया जाए।
‘चुनावी हलफनामे में कुछ नहीं छिपाया’- घनश्याम सिंह का दावा
दूसरी तरफ, विधायक घनश्याम सिंह ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को बेबुनियाद और राजनीतिक द्वेष से प्रेरित बताया है। उनका कहना है कि 1991 के जिस मामले की बात की जा रही है, उसमें उनके खिलाफ कोई केस या कानूनी प्रक्रिया दर्ज ही नहीं हुई थी। विधायक ने स्पष्ट किया कि हलफनामे में केवल उन्हीं मामलों की जानकारी देना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है जो औपचारिक रूप से पुलिस या कोर्ट की प्रक्रिया के दायरे में हों। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को पूरी ईमानदारी से ब्योरा दिया गया है और उपचुनाव में मिली करारी हार से हताश विरोधी अब बेवजह विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।
दस्तावेजों की जांच के बाद साफ होगी स्थिति
कानूनी जानकारों के अनुसार, अब गेंद हाईकोर्ट के पाले में है। अदालत में पेश होने वाले तत्कालीन पुलिस रिकॉर्ड, केस डायरी और संबंधित दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि क्या 1991 के उस मामले में घनश्याम सिंह के खिलाफ कोई कानूनी बाध्यता बनती थी या नहीं। बहरहाल, याचिका दायर होने के बाद दतिया की स्थानीय राजनीति में बयानबाजी का नया दौर शुरू हो गया है।

