‘4.5 लाख लड़कियां हर साल भागती हैं, 9 लाख बच्चे पैदा होते हैं’: गरबा पंडालों में एंट्री पर उषा ठाकुर का दावा
इंदौर। शारदीय नवरात्रि से ठीक पहले मध्य प्रदेश की सियासत में गरबा आयोजनों और पंडालों में प्रवेश को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। पूर्व मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेत्री उषा ठाकुर ने एक बार फिर गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की वकालत की है। एक बातचीत के दौरान उन्होंने बेहद सनसनीखेज दावा करते हुए कहा कि गरबा आयोजनों के माध्यम से बड़े पैमाने पर युवतियों का धर्मांतरण और पलायन हो रहा है, जिसका सीधा असर देश की जनसांख्यिकी पर पड़ रहा है।
4.5 लाख लड़कियों और 9 लाख बच्चों का दावा, आंकड़े का आधार नदारद
बातचीत के दौरान उषा ठाकुर ने दावा किया कि हर साल गरबा आयोजनों के दौरान करीब 4.5 लाख हिंदू लड़कियां ‘विधर्मियों’ के साथ चली जाती हैं और इसके परिणामस्वरूप हर साल करीब 9 लाख बच्चों का जन्म होता है, जिससे जनसंख्या असंतुलन पैदा हो रहा है। हालांकि, पूर्व मंत्री ने अपने इस विशाल आंकड़े के समर्थन में किसी भी सरकारी रिपोर्ट, पुलिस रिकॉर्ड, जनगणना आंकड़े या अधिकृत अध्ययन का कोई संदर्भ नहीं दिया। विश्लेषकों का मानना है कि बिना किसी आधिकारिक साक्ष्य के इतने बड़े आंकड़े को पेश करना केवल राजनीतिक और भावनात्मक ध्रुवीकरण का हिस्सा जान पड़ता है।
‘पहचान बदलकर भ्रमित करने वालों के प्रवेश पर लगे रोक’
उषा ठाकुर ने गरबा पंडालों की सुरक्षा और व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्व अपनी असली पहचान छिपाकर या भेष बदलकर गरबा स्थलों में दाखिल होते हैं और भोली-भाली युवतियों को गुमराह करते हैं। उन्होंने इसे एक सोची-समझी साजिश करार देते हुए कहा कि हिंदू संगठनों द्वारा ऐसे लोगों को पंडालों से दूर रखने का फैसला पूरी तरह न्यायसंगत है। उन्होंने साफ कहा कि गरबा देवी भगवती की आराधना और शक्ति की साधना का पर्व है, इसलिए जो लोग मूर्ति पूजा में यकीन नहीं रखते, उन्हें इन धार्मिक आयोजनों में शामिल होने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
‘साधना की जगह टैटू और कपड़ों का शो बन गए गरबे’
गरबों के आधुनिक और व्यावसायिक स्वरूप पर भी पूर्व मंत्री ने कड़ा एतराज जताया। उन्होंने विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल द्वारा कमर्शियल आयोजनों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों का समर्थन करते हुए कहा:
व्यावसायिकता पर चोट: गरबा मूल रूप से महिलाओं के आंतरिक सशक्तिकरण और शक्ति उपासना का पर्व था, लेकिन अब यह केवल महंगे परिधानों, आभूषणों और टैटू के प्रदर्शन का साधन बनकर रह गया है।
परंपरा और मर्यादा की अपील: नवरात्रि की मूल भावना साधना और तपस्या से जुड़ी है। आयोजकों को व्यापारिक मुनाफे के चक्कर में इस पर्व की सांस्कृतिक मर्यादा को तार-तार नहीं होने देना चाहिए।
2014 से लगातार उठ रहा पहचान सत्यापन का मुद्दा
गरबा पंडालों में पहचान पत्र देखकर ही प्रवेश देने का उषा ठाकुर का यह रुख नया नहीं है। साल 2014 में भी, जब वे इंदौर से विधायक थीं, तब उन्होंने आयोजकों से केवल हिंदू पुरुषों को प्रवेश देने और पहचान पत्र जांचने की खुली अपील कर विवाद खड़ा कर दिया था। अब नवरात्रि से पहले 4.5 लाख लड़कियों के इस नए दावे ने राज्य में एक बार फिर तीखी बहस छेड़ दी है।

