क्या अब मंदिर में पुजारियों को मिलेगा कर्मचारी का दर्जा?
वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मंदिरों में कार्यरत पुजारियों और कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन, PF, ESI और कर्मचारी का दर्जा देने की मांग की है।
Ashwini Upadhyay द्वारा दायर एक याचिका में मंदिरों में कार्यरत पुजारियों, सेवादारों, सफाईकर्मियों और सुरक्षा कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर बड़ा सवाल उठाया गया है। याचिका में कहा गया है कि देशभर के कई मंदिरों में काम करने वाले कर्मचारियों को अकुशल श्रमिकों के लिए तय न्यूनतम वेतन से भी कम पारिश्रमिक दिया जा रहा है, जो “प्रणालीगत शोषण” की श्रेणी में आता है।
याचिका में मांग की गई है कि मंदिर कर्मियों को Code on Wages, 2019 की धारा 2(k) के तहत “कर्मचारी” घोषित किया जाए। दलील दी गई है कि जब राज्य सरकारें मंदिरों का प्रशासनिक और वित्तीय नियंत्रण अपने हाथ में लेती हैं, तो वहां “नियोक्ता और कर्मचारी” का संबंध स्वतः बन जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला
याचिकाकर्ता ने Article 21 of the Constitution of India का उल्लेख करते हुए कहा है कि सम्मानजनक वेतन और सामाजिक सुरक्षा से वंचित रखना पुजारियों और मंदिर कर्मियों के “आजीविका के अधिकार” का उल्लंघन है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकारों के बंदोबस्ती विभागों को एक “आदर्श नियोक्ता” की भूमिका निभानी चाहिए और मंदिर कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन, PF, ESI, स्वास्थ्य सुरक्षा और परिवार कल्याण जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए।
मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को लेकर सवाल
याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि जब मस्जिदों और चर्चों का संचालन उनके समुदाय स्वतंत्र रूप से करते हैं, तो हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण क्यों है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि सरकार मंदिरों का संचालन करती है, तो वहां कार्यरत हर कर्मचारी को कानूनी अधिकार और सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।
2026 की बढ़ती महंगाई और जीवन यापन की लागत का हवाला देते हुए अदालत से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है। साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों को मंदिर कर्मियों के कल्याण के लिए ठोस नीति बनाने के निर्देश देने की अपील भी की गई है।
याचिका में कहा गया है कि मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, परंपरा और सनातन चेतना के केंद्र हैं। इसलिए वहां सेवा देने वाले लोगों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा होना जरूरी है।

