Wed. May 13th, 2026

पाउच से प्लास्टिक पन्नी तक सब महंगा: पैकेजिंग उद्योग पर बड़ा असर

पाउच से प्लास्टिक पन्नी तक सब महंगा

रायपुर: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत के बाजारों में भी साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी ने प्लास्टिक उद्योग को गहरे संकट में डाल दिया है। प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण में उपयोग होने वाला कच्चा माल महंगा होने से प्लास्टिक उद्योग की लागत बढ़ गई है। इसका असर अब आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों पर भी पड़ रहा है। कारोबारियों के मुताबिक, प्लास्टिक से बनने वाले लगभग सभी सामानों की कीमतों में 20 से 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। वहीं उत्पादन में कमी और बाजार में मांग घटने जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

प्लास्टिक दाना और स्क्रैप के दाम में रिकॉर्ड बढ़ोतरी

प्लास्टिक उद्योग का सबसे जरूरी कच्चा माल प्लास्टिक दाना होता है। कुछ महीने पहले तक यह करीब 100 रुपए प्रति किलो बिक रहा था, लेकिन अब इसके दाम बढ़कर 180 से 200 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। इसी तरह प्लास्टिक स्क्रैप की कीमतों में भी बड़ा उछाल आया है। पहले 70 से 80 रुपए किलो मिलने वाला स्क्रैप अब 120 से 130 रुपए प्रति किलो तक बिक रहा है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी इसका मुख्य कारण है। प्लास्टिक निर्माण में इस्तेमाल होने वाले एथिलीन और प्रोपलीन जैसे पेट्रोकेमिकल्स सीधे पेट्रोलियम उत्पादों से तैयार किए जाते हैं। ऐसे में तेल महंगा होने का सीधा असर प्लास्टिक उद्योग पर पड़ा है।

पैकेजिंग सामग्री के दाम बढ़ने से कारोबार प्रभावित

दूध, दही, नमकीन, मसाले, खाद्य तेल और अन्य खाद्य पदार्थों की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पाउच और पन्नी अब काफी महंगे हो चुके हैं। राजधानी के कारोबारी राधाकिशन सुंदरानी ने बताया कि पहले जो प्रिंटेड पाउच 200 रुपए किलो मिलते थे, उनकी कीमत अब करीब 300 रुपए किलो हो गई है। इसी प्रकार सिंगल यूज प्लास्टिक पन्नी, जिसका उपयोग छोटे दुकानदार और पैकेजिंग कंपनियां करती हैं, उसके दाम भी तेजी से बढ़े हैं। पहले यह 100 से 120 रुपए किलो उपलब्ध थी, लेकिन अब इसकी कीमत 180 से 200 रुपए किलो तक पहुंच गई है। इससे छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ गया है।

चावल, सीमेंट और तेल कंपनियों की लागत बढ़ी

प्लास्टिक की बढ़ती कीमतों का असर केवल छोटे पैकेजिंग उत्पादों तक सीमित नहीं है। चावल और सीमेंट की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक बोरियों के दाम भी बढ़ गए हैं। खाद्य तेल कंपनियों को भी अब पैकेजिंग पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। कारोबारियों के अनुसार पहले एक लीटर तेल की पैकिंग पर लगभग एक रुपए तक खर्च आता था, लेकिन अब यही खर्च बढ़कर दो रुपए तक पहुंच गया है। पैकिंग लागत बढ़ने से कंपनियों को अपने उत्पादों की कीमतों में भी बढ़ोतरी करनी पड़ रही है, जिसका असर सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है।

उत्पादन घटने से उद्योगों पर संकट

महंगे कच्चे माल और घटती मांग के कारण कई प्लास्टिक उद्योगों ने उत्पादन कम कर दिया है। व्यापारियों का कहना है कि बाजार में खरीदारी पहले की तुलना में कमजोर हुई है। महंगे उत्पादों के कारण ग्राहक भी सीमित मात्रा में खरीदारी कर रहे हैं। प्रदेश में करीब 200 प्लास्टिक उद्योग संचालित हैं। इन उद्योगों से हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। उद्योगपतियों का कहना है कि यदि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो कई छोटे उद्योग आर्थिक संकट में फंस सकते हैं।

सरकार से मदद की मांग

छत्तीसगढ़ चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सतीश थौरानी ने कहा कि प्लास्टिक उद्योग इस समय गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। लगातार बढ़ती लागत के कारण उद्योगों की स्थिति कमजोर हो रही है। उन्होंने सरकार से उद्योगों को राहत देने के लिए विशेष योजना बनाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार सब्सिडी या टैक्स में राहत जैसी सुविधाएं देती है तो उद्योगों को बड़ी मदद मिल सकती है। इससे उत्पादन सामान्य करने और रोजगार बचाने में भी सहायता मिलेगी।

 

 

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